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तीन तलाके के फैसले पर चहकी मुस्लिम महिलाएं
Updated Tue, 22 Aug 2017 11:23 PM IST
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फैसले पर चहकीं मुस्लिम महिलाएं
बस्ती।
सती प्रथा को देश से समाप्त होने के बाद अब तीन तलाक की प्रथा को बॉय-बॉय करने की बारी है। सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय ने मुस्लिम समाज की महिलाओं की सोच को बदल दिया है। कहती हैं कि इतनी खुशी उन्हें किसी खजाना के मिलने से नहीं होगी जितनी खुशी कोर्ट के निर्णय से मिली है। मुस्लिम शिक्षक, छात्राएं, अधिवक्ता और घरेलू महिला सभी ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया और केंद्र से कहा कि ऐसा कानून बनाएं, जिससे कोई आहत न हो और शरीयत का सम्मान भी बरकरार रहे।
राष्ट्रपति पुरस्कार बेगम खैर इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य नीलोफर उस्मानी ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हए कहा कि केंद्र सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिसमें शरीयत का पूरा ध्यान रखा जाए। सबकी भावनाओं का आदर करने वाला कानून होना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता अजमत अली सिद्दीकी ने कहा कि कोर्ट का फैसला मान्य एवं स्वागत योग्य है। केंद्र को कानून बनाने से पहले समाज और धर्म के हित को देखना चाहिए। कहा कि ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें किसी धर्म एवं समाज को कोई ठेस न पहुंचने पाए।
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बीए थर्ड ईयर की छात्रा जैनब खातून ने सुप्रीम कोर्ट का तहे दिल से स्वागत करते हुए कहा कि इससे बहनों के अंदर जो डर और भय था, वह नया कानून बनने से समाप्त हो जाएगा। कहती है कि इस निर्णय की तुलना सती प्रथा के समाप्त होने से करना चाहिए।
बीए थर्ड ईयर की छात्र साजिया खातून ने कहा कि यह निर्णय सर्वोत्तम है। इससे मुस्लिम महिलाओं में तीन तलाक को लेकर व्याप्त भय समाप्त हो जाएगा। उनके अधिकार को समझा जा सकेगा। अपने हक के लिए अब भटकना नहीं पड़ेगा। मुस्लिम महिलाओं में खुशी है।
गनेशपुर के मौलाना अब्दुल्ला ने कोर्ट के निर्णय को अस्वीकार करते हुए कहा कि 1400 पुरानी शरीयत को यूं ही नहीं समाप्त होने दिया जाएगा। पुरानी शरीयत को बदला नहीं जा सकता। हम लोग इस तरह के किसी भी कानून को नहीं मानेंगे। इसके लिए मंथन करेंगे।
सबदहिया के मौलाना गुलाम का कहना है कि इस निर्णय पर मुस्लिम समाज चिंतन करेगा। तथ्यों को पूरी तरह से परखा जाएगा। शरीयत की व्यवस्था ही हमारे लिए उत्तम है। इस व्यवस्था में बदलाव के बारे में मौलाना चिंतन कर रहे हैं। जल्द ही अगला कदम उठाएंगे।
आधी आबादी को मिली मन की मुराद
बस्ती।
मुस्लिम धर्मावलंबियों में तूफान मचाने वाले तीन तलाक मुद्दे पर सर्वोच्च अदालत के ऐतिहासिक फैसले से हजारों-लाखों पीड़ित महिलाओं को मन की मुराद मिल गई। मगर मर्दों में इसे लेकर हिचकिचाहट है। मौलाना खुलेआम इसे धार्मिक अराजकता करार दे रहे हैं। रोचक बात यह कि सिर्फ मुस्लिम महिलाएं ही नहीं आधी आबादी भी इस फैसले से गदगद है। लेकिन पुरुष वर्ग खासकर मौलाना इसे धर्म में दखलंदाजी करार देते हैं। मंगलवार को अमर उजाला ने जब मन टटोलने का प्रयास किया तो सबने खुलकर राय दी।
मांगी थी मन्नत
रुधौली कस्बे के मदरसा रोड पर रहने वाली गृहणी तब्बसुम बानो ने मन्न्त मांगी थी कि यह कुरीति मिटे। महिलाओं की जिंदगी को दोजख बना दिया था।
अब दोजख नहीं होगी जिंदगी
रुधौली की सलीमुन्निशा का कहना है कि गुस्से में कोई कुछ भी बोल जाए। मुंह से निकले शब्द की वजह से जिंदगी दोजख हो जाए,यह सर्वथा अनुचित है।
धार्मिक अराजकता का खतरा
जूनियर हाईस्कूल रुधौली के प्रधानाचार्य ग़यासुद्दीन का कहना है कि तीन तलाक खत्म करके छह महीने में कानून बनाने का फैसला स्वागत योग्य है।
मुसलमानों पर नाइंसाफी
छावनी के मौलाना हमीद रजा का कहना है कि तीन तलाक पर कानून बनाना मुसलमानों के साथ नाइंसाफी है। इसे मुसलमानों पर जबरन थोपा जा रहा है।
कोर्ट के फैसले का सम्मान
भानपुर के समाज सेवी हाजी नसीबदार कहते हैं कि वे कोर्ट के फैसले का पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन शरीयत को ध्यान में रखकर कानून बने। अहित न हो।
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बस्ती।
सती प्रथा को देश से समाप्त होने के बाद अब तीन तलाक की प्रथा को बॉय-बॉय करने की बारी है। सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय ने मुस्लिम समाज की महिलाओं की सोच को बदल दिया है। कहती हैं कि इतनी खुशी उन्हें किसी खजाना के मिलने से नहीं होगी जितनी खुशी कोर्ट के निर्णय से मिली है। मुस्लिम शिक्षक, छात्राएं, अधिवक्ता और घरेलू महिला सभी ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया और केंद्र से कहा कि ऐसा कानून बनाएं, जिससे कोई आहत न हो और शरीयत का सम्मान भी बरकरार रहे।
राष्ट्रपति पुरस्कार बेगम खैर इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य नीलोफर उस्मानी ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हए कहा कि केंद्र सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिसमें शरीयत का पूरा ध्यान रखा जाए। सबकी भावनाओं का आदर करने वाला कानून होना चाहिए।
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वरिष्ठ अधिवक्ता अजमत अली सिद्दीकी ने कहा कि कोर्ट का फैसला मान्य एवं स्वागत योग्य है। केंद्र को कानून बनाने से पहले समाज और धर्म के हित को देखना चाहिए। कहा कि ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें किसी धर्म एवं समाज को कोई ठेस न पहुंचने पाए।
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बीए थर्ड ईयर की छात्रा जैनब खातून ने सुप्रीम कोर्ट का तहे दिल से स्वागत करते हुए कहा कि इससे बहनों के अंदर जो डर और भय था, वह नया कानून बनने से समाप्त हो जाएगा। कहती है कि इस निर्णय की तुलना सती प्रथा के समाप्त होने से करना चाहिए।
बीए थर्ड ईयर की छात्र साजिया खातून ने कहा कि यह निर्णय सर्वोत्तम है। इससे मुस्लिम महिलाओं में तीन तलाक को लेकर व्याप्त भय समाप्त हो जाएगा। उनके अधिकार को समझा जा सकेगा। अपने हक के लिए अब भटकना नहीं पड़ेगा। मुस्लिम महिलाओं में खुशी है।
गनेशपुर के मौलाना अब्दुल्ला ने कोर्ट के निर्णय को अस्वीकार करते हुए कहा कि 1400 पुरानी शरीयत को यूं ही नहीं समाप्त होने दिया जाएगा। पुरानी शरीयत को बदला नहीं जा सकता। हम लोग इस तरह के किसी भी कानून को नहीं मानेंगे। इसके लिए मंथन करेंगे।
सबदहिया के मौलाना गुलाम का कहना है कि इस निर्णय पर मुस्लिम समाज चिंतन करेगा। तथ्यों को पूरी तरह से परखा जाएगा। शरीयत की व्यवस्था ही हमारे लिए उत्तम है। इस व्यवस्था में बदलाव के बारे में मौलाना चिंतन कर रहे हैं। जल्द ही अगला कदम उठाएंगे।
आधी आबादी को मिली मन की मुराद
बस्ती।
मुस्लिम धर्मावलंबियों में तूफान मचाने वाले तीन तलाक मुद्दे पर सर्वोच्च अदालत के ऐतिहासिक फैसले से हजारों-लाखों पीड़ित महिलाओं को मन की मुराद मिल गई। मगर मर्दों में इसे लेकर हिचकिचाहट है। मौलाना खुलेआम इसे धार्मिक अराजकता करार दे रहे हैं। रोचक बात यह कि सिर्फ मुस्लिम महिलाएं ही नहीं आधी आबादी भी इस फैसले से गदगद है। लेकिन पुरुष वर्ग खासकर मौलाना इसे धर्म में दखलंदाजी करार देते हैं। मंगलवार को अमर उजाला ने जब मन टटोलने का प्रयास किया तो सबने खुलकर राय दी।
मांगी थी मन्नत
रुधौली कस्बे के मदरसा रोड पर रहने वाली गृहणी तब्बसुम बानो ने मन्न्त मांगी थी कि यह कुरीति मिटे। महिलाओं की जिंदगी को दोजख बना दिया था।
अब दोजख नहीं होगी जिंदगी
रुधौली की सलीमुन्निशा का कहना है कि गुस्से में कोई कुछ भी बोल जाए। मुंह से निकले शब्द की वजह से जिंदगी दोजख हो जाए,यह सर्वथा अनुचित है।
धार्मिक अराजकता का खतरा
जूनियर हाईस्कूल रुधौली के प्रधानाचार्य ग़यासुद्दीन का कहना है कि तीन तलाक खत्म करके छह महीने में कानून बनाने का फैसला स्वागत योग्य है।
मुसलमानों पर नाइंसाफी
छावनी के मौलाना हमीद रजा का कहना है कि तीन तलाक पर कानून बनाना मुसलमानों के साथ नाइंसाफी है। इसे मुसलमानों पर जबरन थोपा जा रहा है।
कोर्ट के फैसले का सम्मान
भानपुर के समाज सेवी हाजी नसीबदार कहते हैं कि वे कोर्ट के फैसले का पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन शरीयत को ध्यान में रखकर कानून बने। अहित न हो।