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Bareilly News: 106 साल पहले कत्था फैक्टरी से शुरू हुई थी उद्योगों की कथा
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बरेली। कुमाऊं गेटवे कहे जाने वाले बरेली में उद्योगों की शुरुआत देश की आजादी से पहले वर्ष 1919 में कत्था फैक्टरी की स्थापना के साथ हुई थी। औद्योगिक घराने बरेली आए और उनके उत्पादों ने देश में ही नहीं बल्कि एशिया महाद्वीप में अपनी पहचान बनाई। गृह उद्योग से इतर बरेली की पहचान उद्योग नगरी के तर्ज पर होने लगी। हालांकि बाद में कई वजहों से उद्योग दम तोड़ने लगे। मगर, 106 वर्ष बाद भी कत्था फैक्टरी ने अपना वजूद कायम रखा है।
इज्जतनगर नैनीताल रोड पर इंडियन वुड प्रोडक्ट्स कंपनी (कत्था फैक्टरी) को ब्रिटिश उद्यमी एचएन ग्लैडस्टोन, एच बेटसन, ईएच ब्रे व अन्य ने संयुक्त रूप से शुरू किया था। निर्माण गतिविधियां साल भर बाद 1920 में शुरू हुईं। देश की आजादी के बाद वर्ष 1962 तक कंपनी उद्योग निदेशक कानपुर के अधीन थी। 1963 में कंपनी को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा औद्योगिक लाइसेंस मिला। वर्ष 1980 में वर्तमान प्रबंधन ने कंपनी के शेयरों का अधिग्रहण कर लिया। हिस्सेदारी बढ़ने पर कोलकाता के केके मोहता अध्यक्ष, भरत मोहता मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनें। वर्तमान में बरेली के राजकुमार अग्रवाल एग्जीक्युटिव वाइस प्रेसीडेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कंपनी कत्था और कच्छ (कथा बनाने के लिए जरूरी सामग्री) के साथ मसाला उत्पाद भी तैयार कर रही है। ब्यूरो
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आजादी से पहले स्थापित हुई थी आईटीआर, विमको फैक्टरी
वरिष्ठ उद्यमी सुरेश सुंदरानी के मुताबिक, सीबीगंज में वर्ष 1924 में स्थापित इंडियन टर्पेंटाइन एंड रोजिन फैक्टरी में तारपीन और बिरोजा तैयार होता था। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश अलग होने से उत्तराखंड से मिलने वाला कच्चा माल लीसा की आपूर्ति में अड़चन शुरू हुई और फैक्टरी बंद करनी पड़ी। 1938 में सीबीगंज में स्थापित वेस्टर्न इंडियन मैच कंपनी (विमको) की माचिस की मांग देश भर में थी। आजादी के बाद वर्ष 1960 में फतेहगंज पश्चिमी में एसएंडसी (रबर फैक्टरी) स्थापित हुई, जिसके रबर की मांग एशिया भर में थी।
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1956 में औद्योगिक क्षेत्र बना तो उद्यमों को मिली रफ्तार
वरिष्ठ उद्यमी विमल रिवाड़ी के मुताबिक, यूपी स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट काॅरपोरेशन ने वर्ष 1960 में 275 एकड़ क्षेत्र में परसाखेड़ा औद्योगिक एरिया की स्थापना की। इसमें खाद्य तेल, डिस्टिलरी, कन्फेक्शनरी, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, प्लॉईवुड समेत करीब 150 इकाइयां स्थापित हैं। यूपीएसआईडीसी ने वर्ष 1964 में भोजीपुरा औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की थी। मौजूदा समय में यहां 52 इकाइयां चल रहीं हैं। रजऊ क्षेत्र में भी 55 छोटी-बड़ी यूनिट चल रहीं हैं। फरीदपुर में निजी औद्योगिक क्षेत्र वर्ष 1980 में बसा, जहां 400 से ज्यादा उद्योग स्थापित हैं।
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ये बड़ी फैक्टरियां हुईं बंद
- इंडियन टरपेंटाइन एंड रोजिन (आईटीआर) फैक्टरी में अप्रैल 1998 में उत्पादन प्रभावित होने लगा और बंद हुई।
- फतेहगंज पश्चिमी स्थित रबर फैक्टरी के उत्पाद पूरे एशिया में प्रसिद्ध थे, 15 जुलाई 1999 में फैक्टरी बंद हुई।
- 1932 में स्थापित नेकपुर चीनी मिल 1998 में बंद हुई। 1996 में ज्यादा उत्पादन के लिए गोल्ड मेडल मिला था।
- सीबीगंज स्थित विमको फैक्टरी में माचिस का उत्पादन होता था. वर्ष 2014 में फैक्टरी बंद हो गई।
- बहेड़ी की यूपी सहकारी कताई मिल को भी अगस्त 2010 में बंद कर दिया गया।
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इज्जतनगर नैनीताल रोड पर इंडियन वुड प्रोडक्ट्स कंपनी (कत्था फैक्टरी) को ब्रिटिश उद्यमी एचएन ग्लैडस्टोन, एच बेटसन, ईएच ब्रे व अन्य ने संयुक्त रूप से शुरू किया था। निर्माण गतिविधियां साल भर बाद 1920 में शुरू हुईं। देश की आजादी के बाद वर्ष 1962 तक कंपनी उद्योग निदेशक कानपुर के अधीन थी। 1963 में कंपनी को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा औद्योगिक लाइसेंस मिला। वर्ष 1980 में वर्तमान प्रबंधन ने कंपनी के शेयरों का अधिग्रहण कर लिया। हिस्सेदारी बढ़ने पर कोलकाता के केके मोहता अध्यक्ष, भरत मोहता मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनें। वर्तमान में बरेली के राजकुमार अग्रवाल एग्जीक्युटिव वाइस प्रेसीडेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कंपनी कत्था और कच्छ (कथा बनाने के लिए जरूरी सामग्री) के साथ मसाला उत्पाद भी तैयार कर रही है। ब्यूरो
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आजादी से पहले स्थापित हुई थी आईटीआर, विमको फैक्टरी
वरिष्ठ उद्यमी सुरेश सुंदरानी के मुताबिक, सीबीगंज में वर्ष 1924 में स्थापित इंडियन टर्पेंटाइन एंड रोजिन फैक्टरी में तारपीन और बिरोजा तैयार होता था। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश अलग होने से उत्तराखंड से मिलने वाला कच्चा माल लीसा की आपूर्ति में अड़चन शुरू हुई और फैक्टरी बंद करनी पड़ी। 1938 में सीबीगंज में स्थापित वेस्टर्न इंडियन मैच कंपनी (विमको) की माचिस की मांग देश भर में थी। आजादी के बाद वर्ष 1960 में फतेहगंज पश्चिमी में एसएंडसी (रबर फैक्टरी) स्थापित हुई, जिसके रबर की मांग एशिया भर में थी।
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1956 में औद्योगिक क्षेत्र बना तो उद्यमों को मिली रफ्तार
वरिष्ठ उद्यमी विमल रिवाड़ी के मुताबिक, यूपी स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट काॅरपोरेशन ने वर्ष 1960 में 275 एकड़ क्षेत्र में परसाखेड़ा औद्योगिक एरिया की स्थापना की। इसमें खाद्य तेल, डिस्टिलरी, कन्फेक्शनरी, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, प्लॉईवुड समेत करीब 150 इकाइयां स्थापित हैं। यूपीएसआईडीसी ने वर्ष 1964 में भोजीपुरा औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की थी। मौजूदा समय में यहां 52 इकाइयां चल रहीं हैं। रजऊ क्षेत्र में भी 55 छोटी-बड़ी यूनिट चल रहीं हैं। फरीदपुर में निजी औद्योगिक क्षेत्र वर्ष 1980 में बसा, जहां 400 से ज्यादा उद्योग स्थापित हैं।
ये बड़ी फैक्टरियां हुईं बंद
- इंडियन टरपेंटाइन एंड रोजिन (आईटीआर) फैक्टरी में अप्रैल 1998 में उत्पादन प्रभावित होने लगा और बंद हुई।
- फतेहगंज पश्चिमी स्थित रबर फैक्टरी के उत्पाद पूरे एशिया में प्रसिद्ध थे, 15 जुलाई 1999 में फैक्टरी बंद हुई।
- 1932 में स्थापित नेकपुर चीनी मिल 1998 में बंद हुई। 1996 में ज्यादा उत्पादन के लिए गोल्ड मेडल मिला था।
- सीबीगंज स्थित विमको फैक्टरी में माचिस का उत्पादन होता था. वर्ष 2014 में फैक्टरी बंद हो गई।
- बहेड़ी की यूपी सहकारी कताई मिल को भी अगस्त 2010 में बंद कर दिया गया।