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Bareilly News: महंगी चीनी से खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों पर कीमत बढ़ाने का दबाव
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बरेली। चीनी की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़त ने रसोई के साथ खाद्य प्रसंस्करण उद्यमियों की चिंता बढ़ा दी है। बेकरी, कन्फेक्शनरी, शीतल पेय, आइसक्रीम व अन्य चीनी युक्त उत्पाद संबंधी उद्योग पर असर पड़ने की आशंका है। माह भर बाद उत्पादों की कीमतों पर असर पड़ना तय है।
उद्यमियों के मुताबिक, चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी को सिर्फ स्थानीय मांग से जोड़कर नहीं देखा जा रहा। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे पैदा हुई वैश्विक आपूर्ति, ऊर्जा संबंधी अनिश्चितता के बीच खाद्य पदार्थों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। जून में केंद्र सरकार ने पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति संबंधी मुद्दों के बीच 30 सितंबर तक चीनी निर्यात पर रोक लगाई थी। बावजूद कीमतें बढ़ रही हैं।
कारोबारियों के मुताबिक घरेलू स्तर पर कम उपलब्धता, खराब मौसम से गन्ने की फसल पर असर, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग कीमत बढ़ने की वजह बन रही है। पिछले माह तक 45 रुपये प्रति किलो बिकने वाली चीनी बृहस्पतिवार को थोक में 63 रुपये व फुटकर में 65 रुपये प्रति किलो बिकी।
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10 टन से ज्यादा खपत वाले उद्योगों के पास स्टॉक पाबंदी
उद्यमियों के मुताबिक केंद्र सरकार ने थोक उपभोग पर एक सितंबर से 30 नवंबर तक 10 टन से ज्यादा चीनी खरीद पर पाबंदी लगाई है। इनमें कन्फेक्शनरी कंपनियां, सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, मिठाई विक्रेता व अन्य संस्थागत खरीदार अधिकतम 15 दिन का स्टॉक रख सकेंगे। इससे उद्योगों के सामने एक ओर महंगी चीनी खरीद, दूसरी ओर कीमत बढ़ने की आशंका के बावजूद पहले से बड़ा स्टॉक रखने की सुविधा नहीं होगी। इससे वर्किंग कैपिटल और नकदी प्रबंधन पर भी दबाव बढ़ सकता है।
उद्यमियों के सामने मार्जिन बचाने की भी चुनौती
परसाखेड़ा के खाद्य प्रसंस्करण कारोबारी केके चंदानी के मुताबिक छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के सामने मार्जिन मनी बचाने की चुनौती है। बड़ी कंपनियां कुछ समय तक बढ़ी लागत को मार्जिन में समायोजित कर सकती हैं, पर छोटे कारोबारी के पास गुंजाइश सीमित होती है। इन्हें उत्पाद की कीमत बढ़ानी या पैक का वजन घटाना होगा। तैयार उत्पादों पर पहले ही छोटे उद्यमी कच्चे माल और पैकेजिंग लागत का दबाव सह रहे हैं।
ईंधन के भाव बढ़े पर नहीं बढ़ाई कीमत अब विवश
मिठाई कारोबारी अमित आहूजा के मुताबिक पश्चिम एशिया में युद्ध के बाद से कच्चे माल की कीमत लगातार बढ़ रही है। ईंधन, पैकेजिंग, ड्राई फ्रूट्स महंगा होने के बावजूद कीमत नहीं बढ़ाई। अब चीनी और कुछ मेवे की कीमत और उछली तो जेब से खर्च की नौबत बन जाएगी। हालांकि, लड्डू, घेवर जैसे पारंपरिक मिठाइयों की कीमत में कोई बदलाव नहीं किया है। अन्य उत्पादों की कीमत करीब पांच फीसदी बढ़ानी पड़ी है।
अभी चीनी महंगी फिर महंगे होंगे उत्पाद
मिठाई: रसगुल्ला, बर्फी, गुलाब जामुन, पेड़ा, जलेबी आदि उत्पादों की लागत बढ़ेगी। त्योहारों में मांग बढ़ने से कीमतों में बढ़त की संभावना होगी।
बेकरी, कन्फेक्शनरी: ब्रेड, बिस्किट, केक, पेस्ट्री, रस्क, टॉफी, चॉकलेट आदि उत्पादों में चीनी समेत मैदा, तेल, दूध, पैकेज लागत भी जुड़ती है।
पेय उद्योग: शरबत, फ्लेवर्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, फ्लेवर्ड मिल्क निर्माण इकाइयों की लागत बढ़ने पर वर्तमान में स्थिर कीमत में तेजी हो सकती है।
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उद्यमियों के मुताबिक, चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी को सिर्फ स्थानीय मांग से जोड़कर नहीं देखा जा रहा। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे पैदा हुई वैश्विक आपूर्ति, ऊर्जा संबंधी अनिश्चितता के बीच खाद्य पदार्थों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। जून में केंद्र सरकार ने पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति संबंधी मुद्दों के बीच 30 सितंबर तक चीनी निर्यात पर रोक लगाई थी। बावजूद कीमतें बढ़ रही हैं।
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कारोबारियों के मुताबिक घरेलू स्तर पर कम उपलब्धता, खराब मौसम से गन्ने की फसल पर असर, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग कीमत बढ़ने की वजह बन रही है। पिछले माह तक 45 रुपये प्रति किलो बिकने वाली चीनी बृहस्पतिवार को थोक में 63 रुपये व फुटकर में 65 रुपये प्रति किलो बिकी।
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10 टन से ज्यादा खपत वाले उद्योगों के पास स्टॉक पाबंदी
उद्यमियों के मुताबिक केंद्र सरकार ने थोक उपभोग पर एक सितंबर से 30 नवंबर तक 10 टन से ज्यादा चीनी खरीद पर पाबंदी लगाई है। इनमें कन्फेक्शनरी कंपनियां, सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, मिठाई विक्रेता व अन्य संस्थागत खरीदार अधिकतम 15 दिन का स्टॉक रख सकेंगे। इससे उद्योगों के सामने एक ओर महंगी चीनी खरीद, दूसरी ओर कीमत बढ़ने की आशंका के बावजूद पहले से बड़ा स्टॉक रखने की सुविधा नहीं होगी। इससे वर्किंग कैपिटल और नकदी प्रबंधन पर भी दबाव बढ़ सकता है।
उद्यमियों के सामने मार्जिन बचाने की भी चुनौती
परसाखेड़ा के खाद्य प्रसंस्करण कारोबारी केके चंदानी के मुताबिक छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के सामने मार्जिन मनी बचाने की चुनौती है। बड़ी कंपनियां कुछ समय तक बढ़ी लागत को मार्जिन में समायोजित कर सकती हैं, पर छोटे कारोबारी के पास गुंजाइश सीमित होती है। इन्हें उत्पाद की कीमत बढ़ानी या पैक का वजन घटाना होगा। तैयार उत्पादों पर पहले ही छोटे उद्यमी कच्चे माल और पैकेजिंग लागत का दबाव सह रहे हैं।
ईंधन के भाव बढ़े पर नहीं बढ़ाई कीमत अब विवश
मिठाई कारोबारी अमित आहूजा के मुताबिक पश्चिम एशिया में युद्ध के बाद से कच्चे माल की कीमत लगातार बढ़ रही है। ईंधन, पैकेजिंग, ड्राई फ्रूट्स महंगा होने के बावजूद कीमत नहीं बढ़ाई। अब चीनी और कुछ मेवे की कीमत और उछली तो जेब से खर्च की नौबत बन जाएगी। हालांकि, लड्डू, घेवर जैसे पारंपरिक मिठाइयों की कीमत में कोई बदलाव नहीं किया है। अन्य उत्पादों की कीमत करीब पांच फीसदी बढ़ानी पड़ी है।
अभी चीनी महंगी फिर महंगे होंगे उत्पाद
मिठाई: रसगुल्ला, बर्फी, गुलाब जामुन, पेड़ा, जलेबी आदि उत्पादों की लागत बढ़ेगी। त्योहारों में मांग बढ़ने से कीमतों में बढ़त की संभावना होगी।
बेकरी, कन्फेक्शनरी: ब्रेड, बिस्किट, केक, पेस्ट्री, रस्क, टॉफी, चॉकलेट आदि उत्पादों में चीनी समेत मैदा, तेल, दूध, पैकेज लागत भी जुड़ती है।
पेय उद्योग: शरबत, फ्लेवर्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, फ्लेवर्ड मिल्क निर्माण इकाइयों की लागत बढ़ने पर वर्तमान में स्थिर कीमत में तेजी हो सकती है।