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Bareilly News: बेटों से कम नहीं बेटियां, समान अवसर की दरकार
Sat, 17 Oct 2026 01:49 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Sat, 17 Oct 2026 01:49 AM IST
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बरेली। बेटियां किसी मामले मेें बेटों से कम नहीं। उनको समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए, ताकि वे अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन कर सकें। इसके लिए प्रयास सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर उसका असर दिखना चाहिए। अमर उजाला कार्यालय परिसर में नवरात्र के अवसर पर शुक्रवार को आयोजित महिला सशक्तीकरण संवाद में शहर की महिला शिक्षकों व चिकित्सकों ने ये बातें कहीं।
महिला चिकित्सकों ने अपने कॅरिअर के शुरुआती संघर्षों को साझा किया। उन्होंने बताया कि एक समय था जब परिवार में उनकी पढ़ाई के बजाय शादी पर जोर दिया जाता था। हालांकि, मां, पिता या दादी के प्रोत्साहन से उन्होंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित किया।
डॉक्टरों ने बताया कि जब भी कोई गर्भवती महिला आती है या उसे बेटी पैदा होती है, तो निम्न वर्ग के परिवारों में अक्सर मायूसी छा जाती है। ऐसे में उनका कर्तव्य है कि वे उन्हें बेटा-बेटी के समान होने का पाठ पढ़ाएं। अधिकतर अस्पतालों में नर्स और प्रसूति डॉक्टर महिलाएं ही होती हैं, जिससे उन महिलाओं को सहूलियत मिलती है। इसके परिणामस्वरूप, अगली बार वे अपनी बेटी के साथ गर्व से आती हैं।
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बेटियों को सशक्त बना रहीं शिक्षिकाएं
बेसिक शिक्षा विभाग की महिला शिक्षकों को भी जमीन से जुड़कर कार्य करने का अवसर मिलता है। शिक्षिकाओं ने बताया कि उन्होंने ड्रॉप आउट छात्राओं को आठवीं के बाद दोबारा शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, क्यारा ब्लॉक में 60 छात्राएं फिर स्कूल जा पा रही हैं। यह पहल लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और उन्हें सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
इनकी रही मौजूदगी
इस संवाद कार्यक्रम में प्रगति अग्रवाल, रितु राजीव, पूनम गंगवार, भारती सरन, संध्या, शाहिदा अली, मधु गुप्ता, गायत्री, सोनल, सविता सक्सेना, सीमा सिंह, कनुप्रिया अग्रवाल सहित अन्य महिला चिकित्सक शामिल रहीं। शिक्षिकाओं में शबीना परवीन, सीमा मलिक और सोना रानी ने उपस्थिति दर्ज कराई।
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महिला चिकित्सकों ने अपने कॅरिअर के शुरुआती संघर्षों को साझा किया। उन्होंने बताया कि एक समय था जब परिवार में उनकी पढ़ाई के बजाय शादी पर जोर दिया जाता था। हालांकि, मां, पिता या दादी के प्रोत्साहन से उन्होंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित किया।
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डॉक्टरों ने बताया कि जब भी कोई गर्भवती महिला आती है या उसे बेटी पैदा होती है, तो निम्न वर्ग के परिवारों में अक्सर मायूसी छा जाती है। ऐसे में उनका कर्तव्य है कि वे उन्हें बेटा-बेटी के समान होने का पाठ पढ़ाएं। अधिकतर अस्पतालों में नर्स और प्रसूति डॉक्टर महिलाएं ही होती हैं, जिससे उन महिलाओं को सहूलियत मिलती है। इसके परिणामस्वरूप, अगली बार वे अपनी बेटी के साथ गर्व से आती हैं।
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बेटियों को सशक्त बना रहीं शिक्षिकाएं
बेसिक शिक्षा विभाग की महिला शिक्षकों को भी जमीन से जुड़कर कार्य करने का अवसर मिलता है। शिक्षिकाओं ने बताया कि उन्होंने ड्रॉप आउट छात्राओं को आठवीं के बाद दोबारा शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, क्यारा ब्लॉक में 60 छात्राएं फिर स्कूल जा पा रही हैं। यह पहल लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और उन्हें सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
इनकी रही मौजूदगी
इस संवाद कार्यक्रम में प्रगति अग्रवाल, रितु राजीव, पूनम गंगवार, भारती सरन, संध्या, शाहिदा अली, मधु गुप्ता, गायत्री, सोनल, सविता सक्सेना, सीमा सिंह, कनुप्रिया अग्रवाल सहित अन्य महिला चिकित्सक शामिल रहीं। शिक्षिकाओं में शबीना परवीन, सीमा मलिक और सोना रानी ने उपस्थिति दर्ज कराई।