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हिंदुओं के लिए भाजपा को कोसा, पर मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं ‘परोसा’
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बरेली। पांच साल पहले मुसलमानों के मुद्दों पर खुलकर बोलने वाली सपा भाजपा की हिंदुत्व को भुनाने की नीति के चलते इस बार फूंक-फूंककर कदम रख रही है। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने करीब 35 मिनट के भाषण की शुरुआत हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई की धरती कहकर किया। एक तरफ उन्होंने आला हजरत का नाम लिया तो तुरंत बरेली को नाथ नगरी की जमीन कहना भी नहीं भूले। नवरात्र के व्रतों का जिक्र करके जहां भाजपा को कोसा, लेकिन पूरे भाषण में मुस्लिमों के लिए ऐसा कुछ नहीं बोला कि हिंदू बुरा मान जाएं।
2014 के चुनाव प्रचार में सपा की देश बनाओ-देश बचाओ रैली इसी जगह हुई थी। उसमें पुलिस भर्ती में मुस्लिमों को तरजीह देने समेत कई मुद्दों पर सपा नेता खुलकर बोले थे। हिंदू मतदाता में इसकी प्रतिक्रिया दिखाई दी थी। हाल ही में मायावती ने सहारनपुर में मुसलमानों से गठबंधन को वोट देने की अपील की तो भाजपा नेताओं ने तुरंत उसका काउंटर करके हिंदू वोटों को भुनाने की चाल चल दी। अखिलेश शायद इस बात को समझ गए। इसीलिए अपने भाषण में उन्होंने अधिकांश बातें बिना कोई नाम लिए अप्रत्यक्ष तौर पर कहीं। वह भाजपा, प्रधानमंत्री मोदी और सीएम योगी पर तंज तो कसते दिखे, लेकिन नाम किसी का नहीं लिया। भाजपा प्रत्याशी संतोष गंगवार को भी खूब निशाने पर रखा, लेकिन सिर्फ मंत्री जी कहकर। भाजपा के किसी बड़े नेता का नाम न लेना अखिलेश की सावधानी को साफ बयां कर गया। कोई भी ऐसी बात नहीं कही कि भाजपा उनके मुद्दों को पकड़कर हिंदू मतदाताओं में गठबंधन का जनाधार कमजोर कर सके।
पिछड़े वर्ग की जातियों को साधने की कोशिश
अखिलेश ने पिछड़े वर्ग में केवल यादवों पर ही नहीं, बल्कि कुर्मियों समेत अन्य जातियों को भी अप्रत्यक्ष रूप से साधने की कोशिश की। 10 फीसदी आरक्षण की खुलकर आलोचना न करके सवर्णों को नाराज करने का जोखिम लेना ठीक नहीं समझा। पिछड़े वर्ग की जातियों से आए लोगों को यह जरूर समझा दिया कि मोदी सरकार के 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को देने से उनका कितना नुकसान है। अखिलेश अपने भाषण के दौरान मुस्लिम, यादव, जाटव समेत अन्य पिछड़ी और दलित जातियों को गोलबंद करते दिखे। मगर, मुसलमानों के पक्ष में खुलकर बोलने से परहेज किया।
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2014 के चुनाव प्रचार में सपा की देश बनाओ-देश बचाओ रैली इसी जगह हुई थी। उसमें पुलिस भर्ती में मुस्लिमों को तरजीह देने समेत कई मुद्दों पर सपा नेता खुलकर बोले थे। हिंदू मतदाता में इसकी प्रतिक्रिया दिखाई दी थी। हाल ही में मायावती ने सहारनपुर में मुसलमानों से गठबंधन को वोट देने की अपील की तो भाजपा नेताओं ने तुरंत उसका काउंटर करके हिंदू वोटों को भुनाने की चाल चल दी। अखिलेश शायद इस बात को समझ गए। इसीलिए अपने भाषण में उन्होंने अधिकांश बातें बिना कोई नाम लिए अप्रत्यक्ष तौर पर कहीं। वह भाजपा, प्रधानमंत्री मोदी और सीएम योगी पर तंज तो कसते दिखे, लेकिन नाम किसी का नहीं लिया। भाजपा प्रत्याशी संतोष गंगवार को भी खूब निशाने पर रखा, लेकिन सिर्फ मंत्री जी कहकर। भाजपा के किसी बड़े नेता का नाम न लेना अखिलेश की सावधानी को साफ बयां कर गया। कोई भी ऐसी बात नहीं कही कि भाजपा उनके मुद्दों को पकड़कर हिंदू मतदाताओं में गठबंधन का जनाधार कमजोर कर सके।
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पिछड़े वर्ग की जातियों को साधने की कोशिश
अखिलेश ने पिछड़े वर्ग में केवल यादवों पर ही नहीं, बल्कि कुर्मियों समेत अन्य जातियों को भी अप्रत्यक्ष रूप से साधने की कोशिश की। 10 फीसदी आरक्षण की खुलकर आलोचना न करके सवर्णों को नाराज करने का जोखिम लेना ठीक नहीं समझा। पिछड़े वर्ग की जातियों से आए लोगों को यह जरूर समझा दिया कि मोदी सरकार के 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को देने से उनका कितना नुकसान है। अखिलेश अपने भाषण के दौरान मुस्लिम, यादव, जाटव समेत अन्य पिछड़ी और दलित जातियों को गोलबंद करते दिखे। मगर, मुसलमानों के पक्ष में खुलकर बोलने से परहेज किया।
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