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Barabanki News: चेते नहीं तो विलुप्त हो जाएंगे महुआ के पेड़, कटान पर रोक
Fri, 08 Nov 2024 12:57 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Fri, 08 Nov 2024 12:57 AM IST
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बाराबंकी। महुआ के नीचे मोती झरे, महुआ के... कवि हरिवंशराय बच्चन का यह लोकगीत महुआ के पेड़ के महत्व को रेखांकित करने के लिए काफी है। मगर जिले में 12-15 वर्षों के दौरान महुआ के पेड़ों की संख्या इतनी घटती चली गई कि आज यह कई गांवों से विलुप्त हो चुका है। यही हाल रहा तो आने वाले कुछ सालों में महुए का वृक्ष खोजने से भी नहीं मिलेगा।
दरअसल, महुआ जिले की संस्कृति व रहन सहन से जुड़ा है। 25-20 साल पहले की बात करें तो हर गांव में महुआ का पेड़ बहुतायत में थे। मार्च व अप्रैल में इनमें फूल की बहार आती है, महुआ अपने आप जमीन पर टपकने लगता है। गांवों में महुआ बीनने की परंपरा सदियों पुरानी है। महुआ के फूल को सुखाकर भंडारित किया जाता है।
जानकारों के अनुसार पिछले 12 से 15 सालों में महुआ के पेड़ों का काफी क्षरण हुआ। लोगों ने कम समय में अधिक लाभ देने वाले सागौन, यूकेलिप्टस, पापुलर व आम आदि के पौधे तो रोपे मगर महुआ के पौधे लगाए ही नहीं गए।
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महुआ के पेड़ की उम्र करीब 60 साल मानी जाती है, पुराने पेड़ सूख गए या गिर गए। इसके नए पौधे बहुत कम लगाए जा रहे हैं। पौधरोपण अभियान में भी महुआ को महत्व नहीं दिया जा रहा है। बाराबंकी-देवा मार्ग पर कुछ साल पहले महुआ के पेड़ों की कतार थी मगर आज नहीं हैं।
असंद्रा क्षेत्र के अकोहरी गांव के रमेशचंद्र बताते हैं कि गांव में पहले महुआ के पचासों पेड़ थे मगर आज कुछ ही बचे हैं। इस बात को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग ने महुए के पेड़ों के कटान पर रोक लगा रखी है। इसके परमिट जारी नहीं किए जा रहे हैं। अब महुआ के पौधों का रोपण करना जरूरी हो गया है। विभाग इसके लिए भी योजना बना रहा है।
महुआ के फूल, फल व तेल का होता है प्रयोग
भोर में महुआ का मीठा फूल बीनने के बाद ग्रामीण उसे धूप में सुखाते हैं। पहले इसे चना या मटर संग उबालकर नाश्ता करने की परंपरा रही। महुआ के फूल से बड़ा बनते थे। इसके फल को कोलैया कहा जाता है। इससे सब्जी बनाई जाती है। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है जो औषधि के रूप में प्रयोग होता है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूती होती है। इसकी छाल डायबिटीज के रोगियों के लिए उपयोगी होती है।
महुआ के संरक्षण के लिए तत्पर है विभाग
लोग व्यावसायिक दृष्टिकोण से ऐसे पौधे लगा रहे हैं जो कम समय में तैयार हो जाते हैं। महुआ के पेड़ों की कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है। लेकिन विभाग महुआ के संरक्षण के लिए तत्पर है। महुआ के पौधों को रोपने की योजना बनाई जा रही है।
- आकाशदीप बधावन, डीएफओ
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दरअसल, महुआ जिले की संस्कृति व रहन सहन से जुड़ा है। 25-20 साल पहले की बात करें तो हर गांव में महुआ का पेड़ बहुतायत में थे। मार्च व अप्रैल में इनमें फूल की बहार आती है, महुआ अपने आप जमीन पर टपकने लगता है। गांवों में महुआ बीनने की परंपरा सदियों पुरानी है। महुआ के फूल को सुखाकर भंडारित किया जाता है।
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जानकारों के अनुसार पिछले 12 से 15 सालों में महुआ के पेड़ों का काफी क्षरण हुआ। लोगों ने कम समय में अधिक लाभ देने वाले सागौन, यूकेलिप्टस, पापुलर व आम आदि के पौधे तो रोपे मगर महुआ के पौधे लगाए ही नहीं गए।
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महुआ के पेड़ की उम्र करीब 60 साल मानी जाती है, पुराने पेड़ सूख गए या गिर गए। इसके नए पौधे बहुत कम लगाए जा रहे हैं। पौधरोपण अभियान में भी महुआ को महत्व नहीं दिया जा रहा है। बाराबंकी-देवा मार्ग पर कुछ साल पहले महुआ के पेड़ों की कतार थी मगर आज नहीं हैं।
असंद्रा क्षेत्र के अकोहरी गांव के रमेशचंद्र बताते हैं कि गांव में पहले महुआ के पचासों पेड़ थे मगर आज कुछ ही बचे हैं। इस बात को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग ने महुए के पेड़ों के कटान पर रोक लगा रखी है। इसके परमिट जारी नहीं किए जा रहे हैं। अब महुआ के पौधों का रोपण करना जरूरी हो गया है। विभाग इसके लिए भी योजना बना रहा है।
महुआ के फूल, फल व तेल का होता है प्रयोग
भोर में महुआ का मीठा फूल बीनने के बाद ग्रामीण उसे धूप में सुखाते हैं। पहले इसे चना या मटर संग उबालकर नाश्ता करने की परंपरा रही। महुआ के फूल से बड़ा बनते थे। इसके फल को कोलैया कहा जाता है। इससे सब्जी बनाई जाती है। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है जो औषधि के रूप में प्रयोग होता है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूती होती है। इसकी छाल डायबिटीज के रोगियों के लिए उपयोगी होती है।
महुआ के संरक्षण के लिए तत्पर है विभाग
लोग व्यावसायिक दृष्टिकोण से ऐसे पौधे लगा रहे हैं जो कम समय में तैयार हो जाते हैं। महुआ के पेड़ों की कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है। लेकिन विभाग महुआ के संरक्षण के लिए तत्पर है। महुआ के पौधों को रोपने की योजना बनाई जा रही है।
- आकाशदीप बधावन, डीएफओ