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पीएम को बताएंगे, बकस्वाहा बचाएंगे
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बांदा। बुंदेलखंड के पन्ना टाइगर रिजर्व और बकस्वाहा जंगल समेत आसपास के गांवों को उजड़ने से बचाने का मुद्दा अब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक जाएगा। उन तक यहां आबाद आदिवासियों की मांग पहुंचेगी। ये एलान पद्मश्री वन पुरुष जादव मुलाई पायेंग ने किया।
पिछले दो दिनों से मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में डेरा डाले वन पुरुष जादव मुलाई पायेंग ने मंगलवार को केन-बेतवा लिंक से प्रभावित होने वाले गांवों का मौके पर जाकर जायजा लिया। यहां आबाद आदिवासियों से बातचीत की।
पलकौंहा गांव और केन-बेतवा लिंक में प्रस्तावित बांध स्थल दौढ़न गांव में चौपाल लगाईं। उनके साथ बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान से जुड़े कार्यकर्ता छतरपुर के अमित भटनागर, भोपाल के शरद सिंह कुमरे और पर्यावरणविद अश्वनी दुबे भी थे।
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जादव ने बकस्वाहा जंगल में चट्टानों पर बने आदिम सभ्यता व संस्कृति के प्रतीक शैल चित्रों को भी देखा। उन्होंने इन्हें विश्व धरोहर घोषित करने की मांग का समर्थन किया।
मुलाई और उनकी टीम ने केन नदी पर बने गंगऊ वियर/बांध को भी देखा। केन-बेतवा गठजोड़ से इस बांध पर भी असर पड़ेगा। इसके पूर्व मुलाई ने सिवनी स्कूल में छात्र-छात्राओं को संबोधित किया। मुलाई देश के इकलौते वन पुरुष के खिताब से सम्मानित हुए हैं। पर्यावरण प्रेमी है।
उन्होंने असम में 1360 एकड़ में हरा भरा जंगल खड़ा कर रखा है। बड़ी तादाद में यहां पशु-पक्षी आबाद हैं। मुलाई की प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी की थी। फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन सहित दुनिया भर में उनके प्रशंसक और समर्थक हैं।
गौरतलब है कि फिलहाल बकस्वाहा जंगल में हीरा खदान पर एनजीटी ने रोक लगा रखी है। एनजीटी और हाईकोर्ट दोनों में ही यह मामला लंबित है। अलबत्ता केन-बेतवा नदी गठजोड़ पर काम शुरू हो रहा है। अगले माह झांसी में इसका शिलान्यास करने की खबरें हैं।
जंगल में यातनाएं सह रहे हैं आदिवासी
केन-बेतवा लिंक से प्रभावित होने वाले गांवों में चौपाल को संबोधित करते हुए वन पुरुष जादव मुलाई पायेंग ने आदिवासियों से कहा कि मैने यहां आकर देखा है कि आप (आदिवासी) कितने जंगल के अंदर रह रहे हैं।
किन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। कहा कि वह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलकर यहां के आदिवासियों की मांग उन्हें बताएंगे। मुलाई ने कहा कि आदिवासी अपनी मांग उठाते रहे हैं। कहा कि यहां के शैलचित्र संरक्षित करना जरूरी है, क्योंकि ये आदिवासी आदिम सभ्यता और संस्कृति का मूल प्रमाण हैं।
वन पुरुष ने आदिवासियों से कहा कि उन्हें आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल के लिए कितनी यातनाएं सहनी पड़ रहीं हैं, यह देखकर वह दुखी हैं। उन्होंने कहा कि इसमें सुधार और वन अधिकार की वह मांग करेंगे।
पन्ना टाइगर की छह हजार हेक्टेयर भूमि ली
पन्ना टाइगर रिजर्व की छह हजार हेक्टेयर वन भूमि सरकार ने ले ली है। कई हेक्टेयर भूमि का किसानों को मुआवजा नहीं दिया गया। यहां आदिवासियों के 10 गांव आबाद हैं। इनमें चार गांवों को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय वर्ष 2010 में कागजी तौर पर विस्थापित कर चुका, जबकि मौके पर यह गांव बरकरार हैं।
प्राचीनतम शैलचित्र हमारे गौरव
वन पुरुष के साथ पर्यावरण पैरोकारों की टीम ने बकस्वाहा क्षेत्र के जंगल, जटाशंकर और मौना शैय्या सहित कई स्थानों पर शैल चित्र देखे। शरद कुमरे और अमित भटनागर के साथ यहां जटाशंकर न्यास अध्यक्ष अरविंद अग्रवाल भी थे।
वन पुरुष ने कहा कि हमारे लिए यह गौरव की बात है कि दुनिया के इतने प्राचीनतम शैलचित्र धरोहर हमारे देश के बुंदेलखंड में हैं। टीम ने गंगऊ बांध का भी अवलोकन किया। पर्यावरण पैरोकारों की टीम में दिनेश मिश्रा, बहादुर आदिवासी, बबलू कुशवाहा, हिसाबी राजपूत, गौरीशंकर यादव, तुलसी आदिवासी भी शामिल रहे।
राम मंदिर की तरह केन-बेतवा में भी समीकरण
पर्यावरण पैरोकार, बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन/केन-बेतवा संघर्ष समन्वय समिति के आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि केंद्र व यूपी-एमपी सरकारें यूपी विधान सभा चुनाव से पहले केन-बेतवा लिंक परियोजना को शुरू करना चाहतीं हैं।
राम मंदिर की तरह इसमें भी उनके अपने राजनीतिक लाभ और समीकरण हैं, जबकि जमीनी हकीकत ये है कि परियोजना स्थल पर आबाद आदिवासी और ग्रामीण केन-बेतवा लिंक परियोजना के डीपीआर से भी अनभिज्ञ हैं। सीसी की रिपोर्ट को दरकिनार कर योजना पर कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
एक्ट के अनुसार कंक्रीट निर्माण पर रोक
पर्यावरण पैरोकारों का कहना है कि वन्य जीव अभ्यारण्य के अनुसार बफर जोन या वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में कंक्रीट के निर्माण पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद सरकार पन्ना टाइगर में प्रोजेक्ट स्थापित कर रही है।
पर्यावरण कार्यकर्ता अमित भटनागर का कहना है कि दो करोड़ जनसंख्या वाले बुंदेलखंड में सरकार अगर 18 हजार करोड़ रुपये में प्रति व्यक्ति बंटवारा करती तो दो करोड़ रुपये हर बुंदेली के हिस्से में आते।
कहा कि केंद्र व राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी (सीईसी) की गाइडलाइन को दरकिनार कर दो नदियों को जोड़कर विशाल जंगल को खत्म करने पर आमादा है। इसके बाद बुंदेलखंड ऑक्सीजन संकट से जूझेगा।
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पिछले दो दिनों से मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में डेरा डाले वन पुरुष जादव मुलाई पायेंग ने मंगलवार को केन-बेतवा लिंक से प्रभावित होने वाले गांवों का मौके पर जाकर जायजा लिया। यहां आबाद आदिवासियों से बातचीत की।
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पलकौंहा गांव और केन-बेतवा लिंक में प्रस्तावित बांध स्थल दौढ़न गांव में चौपाल लगाईं। उनके साथ बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान से जुड़े कार्यकर्ता छतरपुर के अमित भटनागर, भोपाल के शरद सिंह कुमरे और पर्यावरणविद अश्वनी दुबे भी थे।
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जादव ने बकस्वाहा जंगल में चट्टानों पर बने आदिम सभ्यता व संस्कृति के प्रतीक शैल चित्रों को भी देखा। उन्होंने इन्हें विश्व धरोहर घोषित करने की मांग का समर्थन किया।
मुलाई और उनकी टीम ने केन नदी पर बने गंगऊ वियर/बांध को भी देखा। केन-बेतवा गठजोड़ से इस बांध पर भी असर पड़ेगा। इसके पूर्व मुलाई ने सिवनी स्कूल में छात्र-छात्राओं को संबोधित किया। मुलाई देश के इकलौते वन पुरुष के खिताब से सम्मानित हुए हैं। पर्यावरण प्रेमी है।
उन्होंने असम में 1360 एकड़ में हरा भरा जंगल खड़ा कर रखा है। बड़ी तादाद में यहां पशु-पक्षी आबाद हैं। मुलाई की प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी की थी। फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन सहित दुनिया भर में उनके प्रशंसक और समर्थक हैं।
गौरतलब है कि फिलहाल बकस्वाहा जंगल में हीरा खदान पर एनजीटी ने रोक लगा रखी है। एनजीटी और हाईकोर्ट दोनों में ही यह मामला लंबित है। अलबत्ता केन-बेतवा नदी गठजोड़ पर काम शुरू हो रहा है। अगले माह झांसी में इसका शिलान्यास करने की खबरें हैं।
जंगल में यातनाएं सह रहे हैं आदिवासी
केन-बेतवा लिंक से प्रभावित होने वाले गांवों में चौपाल को संबोधित करते हुए वन पुरुष जादव मुलाई पायेंग ने आदिवासियों से कहा कि मैने यहां आकर देखा है कि आप (आदिवासी) कितने जंगल के अंदर रह रहे हैं।
किन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। कहा कि वह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलकर यहां के आदिवासियों की मांग उन्हें बताएंगे। मुलाई ने कहा कि आदिवासी अपनी मांग उठाते रहे हैं। कहा कि यहां के शैलचित्र संरक्षित करना जरूरी है, क्योंकि ये आदिवासी आदिम सभ्यता और संस्कृति का मूल प्रमाण हैं।
वन पुरुष ने आदिवासियों से कहा कि उन्हें आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल के लिए कितनी यातनाएं सहनी पड़ रहीं हैं, यह देखकर वह दुखी हैं। उन्होंने कहा कि इसमें सुधार और वन अधिकार की वह मांग करेंगे।
पन्ना टाइगर की छह हजार हेक्टेयर भूमि ली
पन्ना टाइगर रिजर्व की छह हजार हेक्टेयर वन भूमि सरकार ने ले ली है। कई हेक्टेयर भूमि का किसानों को मुआवजा नहीं दिया गया। यहां आदिवासियों के 10 गांव आबाद हैं। इनमें चार गांवों को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय वर्ष 2010 में कागजी तौर पर विस्थापित कर चुका, जबकि मौके पर यह गांव बरकरार हैं।
प्राचीनतम शैलचित्र हमारे गौरव
वन पुरुष के साथ पर्यावरण पैरोकारों की टीम ने बकस्वाहा क्षेत्र के जंगल, जटाशंकर और मौना शैय्या सहित कई स्थानों पर शैल चित्र देखे। शरद कुमरे और अमित भटनागर के साथ यहां जटाशंकर न्यास अध्यक्ष अरविंद अग्रवाल भी थे।
वन पुरुष ने कहा कि हमारे लिए यह गौरव की बात है कि दुनिया के इतने प्राचीनतम शैलचित्र धरोहर हमारे देश के बुंदेलखंड में हैं। टीम ने गंगऊ बांध का भी अवलोकन किया। पर्यावरण पैरोकारों की टीम में दिनेश मिश्रा, बहादुर आदिवासी, बबलू कुशवाहा, हिसाबी राजपूत, गौरीशंकर यादव, तुलसी आदिवासी भी शामिल रहे।
राम मंदिर की तरह केन-बेतवा में भी समीकरण
पर्यावरण पैरोकार, बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन/केन-बेतवा संघर्ष समन्वय समिति के आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि केंद्र व यूपी-एमपी सरकारें यूपी विधान सभा चुनाव से पहले केन-बेतवा लिंक परियोजना को शुरू करना चाहतीं हैं।
राम मंदिर की तरह इसमें भी उनके अपने राजनीतिक लाभ और समीकरण हैं, जबकि जमीनी हकीकत ये है कि परियोजना स्थल पर आबाद आदिवासी और ग्रामीण केन-बेतवा लिंक परियोजना के डीपीआर से भी अनभिज्ञ हैं। सीसी की रिपोर्ट को दरकिनार कर योजना पर कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
एक्ट के अनुसार कंक्रीट निर्माण पर रोक
पर्यावरण पैरोकारों का कहना है कि वन्य जीव अभ्यारण्य के अनुसार बफर जोन या वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में कंक्रीट के निर्माण पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद सरकार पन्ना टाइगर में प्रोजेक्ट स्थापित कर रही है।
पर्यावरण कार्यकर्ता अमित भटनागर का कहना है कि दो करोड़ जनसंख्या वाले बुंदेलखंड में सरकार अगर 18 हजार करोड़ रुपये में प्रति व्यक्ति बंटवारा करती तो दो करोड़ रुपये हर बुंदेली के हिस्से में आते।
कहा कि केंद्र व राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी (सीईसी) की गाइडलाइन को दरकिनार कर दो नदियों को जोड़कर विशाल जंगल को खत्म करने पर आमादा है। इसके बाद बुंदेलखंड ऑक्सीजन संकट से जूझेगा।