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ताजिया और अलम जुलूस के साथ मनाया चेहल्लुम
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बांदा। कर्बला (इराक) के मैदान में इस्लामी कैलेंडर के मोहर्रम माह की 10वीं को शहीद हुए शोहदाए कर्बला की शहादत के 40 दिन बाद मनाया जाने वाला चेहल्लुम रविवार को परंपरागत रस्मों-रिवाजों के साथ मनाया गया। शहर में ताजिए जुलूस निकले। शिया मुस्लिमों का मातम जुलूस आकर्षण का केंद्र रहा।
दोपहर को अलीगंज से टिर्री के इमामबाड़े का बुर्राक ताजिया और अलीगंज से कुदउवा जनाना का ताजिया जुलूस उठा। उधर, बलखंडी नाका से ढपाली बिरादरी का और निम्नीपार से अलम जुलूस निकले। यह सब शहर के विभिन्न रास्तों से गुजरकर बलखंडी नाका चौराहे पर आए। यहां कुछ देर मेला रहा। सूर्यास्त के पहले सभी ताजिए केन नदी किनारे पानी के गड्ढों
में सुपुर्दे आब (विसर्जित) कर दिए गए। मोहर्रम कमेटी अध्यक्ष अब्दुल वहीद, संरक्षक मोहम्मद शोएब, महामंत्री हाशिम आदि उपस्थित रहे। उधर, दोपहर बाद पूर्वी कोठी इमामबाड़ों से शिया मुस्लिमों का मातम जुलूस रवाना हुआ। बड़ी संख्या में युवक और बच्चे काले लिबास में शामिल थे। यह सब सामूहिक मर्सिया और नोहे पढ़ते हुए सीना पीटकर मातम करते रहे। यह अलम जुलूस बलखंडी नाका होता हुआ प्रतीकात्मक कर्बला (केन नदी) किनारे पहुंचा और वहां समापन हुआ।
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दोपहर को अलीगंज से टिर्री के इमामबाड़े का बुर्राक ताजिया और अलीगंज से कुदउवा जनाना का ताजिया जुलूस उठा। उधर, बलखंडी नाका से ढपाली बिरादरी का और निम्नीपार से अलम जुलूस निकले। यह सब शहर के विभिन्न रास्तों से गुजरकर बलखंडी नाका चौराहे पर आए। यहां कुछ देर मेला रहा। सूर्यास्त के पहले सभी ताजिए केन नदी किनारे पानी के गड्ढों
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में सुपुर्दे आब (विसर्जित) कर दिए गए। मोहर्रम कमेटी अध्यक्ष अब्दुल वहीद, संरक्षक मोहम्मद शोएब, महामंत्री हाशिम आदि उपस्थित रहे। उधर, दोपहर बाद पूर्वी कोठी इमामबाड़ों से शिया मुस्लिमों का मातम जुलूस रवाना हुआ। बड़ी संख्या में युवक और बच्चे काले लिबास में शामिल थे। यह सब सामूहिक मर्सिया और नोहे पढ़ते हुए सीना पीटकर मातम करते रहे। यह अलम जुलूस बलखंडी नाका होता हुआ प्रतीकात्मक कर्बला (केन नदी) किनारे पहुंचा और वहां समापन हुआ।
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