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Balrampur News: पूव सांसद रिजवान जहीर को हाईकोर्ट से बड़ी राहत
Tue, 02 Jun 2026 10:48 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Tue, 02 Jun 2026 10:48 PM IST
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फोटो-32-रिजवान जहीर
लखनऊ। बलरामपुर के पूर्व सांसद रिजवान जहीर और रमीज नेमत को गैंगस्टर एक्ट के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से बड़ी राहत मिली है। न्यायालय ने दोनों के खिलाफ दाखिल चार्जशीट, ट्रायल कोर्ट द्वारा लिए गए संज्ञान और जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामले में गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों का समुचित पालन नहीं किया गया।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई करते समय कानून में निर्धारित आवश्यक मानकों का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल आपराधिक मुकदमों का दर्ज होना गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
तुलसीपुर थाने में वर्ष 2024 में दर्ज गैंगस्टर एक्ट के मुकदमे में पुलिस ने रमीज नेमत को गिरोह का सरगना और पूर्व सांसद रिजवान जहीर को गिरोह का सदस्य दर्शाया था। पुलिस द्वारा तैयार गैंग चार्ट में दो आपराधिक मामलों को आधार बनाया गया था। इनमें एक मुकदमे में दोनों के नाम शामिल थे, जबकि दूसरे हत्या के मुकदमे में केवल रमीज नेमत आरोपी थे।
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जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 9 जुलाई 2025 को न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की थी। इसके आधार पर विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) ने 30 जुलाई 2025 को संज्ञान लेते हुए दोनों आरोपियों को तलब किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया। न्यायालय के अनुसार जिस थाना प्रभारी ने 7 जुलाई 2024 को गैंग चार्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भेजा था, उसी अधिकारी ने बाद में दर्ज एफआईआर में उल्लेख किया कि उसे 20 जुलाई 2024 को गश्त के दौरान कथित गिरोह की जानकारी मिली। अदालत ने इस तथ्य को गंभीर मानते हुए कहा कि एफआईआर में वर्णित घटनाक्रम प्रथम दृष्टया विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता।
न्यायालय ने कहा कि गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई तभी की जा सकती है, जब यह स्पष्ट हो कि आरोपित अपराध सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने अथवा अनुचित आर्थिक, भौतिक या अन्य लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किए गए हों। मामले के रिकॉर्ड में ऐसे किसी ठोस साक्ष्य का अभाव पाया गया, जिससे इन आवश्यक शर्तों की पुष्टि हो सके।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जांच अधिकारी, पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी तथा ट्रायल कोर्ट द्वारा गैंगस्टर एक्ट की अनिवार्य शर्तों के संबंध में आवश्यक संतुष्टि दर्ज किए बिना ही कार्रवाई आगे बढ़ाई गई। इसे न्यायालय ने विधि सम्मत प्रक्रिया के विपरीत माना।
इन टिप्पणियों के साथ न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने 9 जुलाई 2025 को दाखिल चार्जशीट तथा 30 जुलाई 2025 के संज्ञान और समन आदेश को निरस्त कर दिया। फैसले के बाद पूर्व सांसद रिजवान जहीर और रमीज नेमत को इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी राहत मिली है।
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न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई करते समय कानून में निर्धारित आवश्यक मानकों का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल आपराधिक मुकदमों का दर्ज होना गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
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तुलसीपुर थाने में वर्ष 2024 में दर्ज गैंगस्टर एक्ट के मुकदमे में पुलिस ने रमीज नेमत को गिरोह का सरगना और पूर्व सांसद रिजवान जहीर को गिरोह का सदस्य दर्शाया था। पुलिस द्वारा तैयार गैंग चार्ट में दो आपराधिक मामलों को आधार बनाया गया था। इनमें एक मुकदमे में दोनों के नाम शामिल थे, जबकि दूसरे हत्या के मुकदमे में केवल रमीज नेमत आरोपी थे।
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जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 9 जुलाई 2025 को न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की थी। इसके आधार पर विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) ने 30 जुलाई 2025 को संज्ञान लेते हुए दोनों आरोपियों को तलब किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया। न्यायालय के अनुसार जिस थाना प्रभारी ने 7 जुलाई 2024 को गैंग चार्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भेजा था, उसी अधिकारी ने बाद में दर्ज एफआईआर में उल्लेख किया कि उसे 20 जुलाई 2024 को गश्त के दौरान कथित गिरोह की जानकारी मिली। अदालत ने इस तथ्य को गंभीर मानते हुए कहा कि एफआईआर में वर्णित घटनाक्रम प्रथम दृष्टया विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता।
न्यायालय ने कहा कि गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई तभी की जा सकती है, जब यह स्पष्ट हो कि आरोपित अपराध सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने अथवा अनुचित आर्थिक, भौतिक या अन्य लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किए गए हों। मामले के रिकॉर्ड में ऐसे किसी ठोस साक्ष्य का अभाव पाया गया, जिससे इन आवश्यक शर्तों की पुष्टि हो सके।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जांच अधिकारी, पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी तथा ट्रायल कोर्ट द्वारा गैंगस्टर एक्ट की अनिवार्य शर्तों के संबंध में आवश्यक संतुष्टि दर्ज किए बिना ही कार्रवाई आगे बढ़ाई गई। इसे न्यायालय ने विधि सम्मत प्रक्रिया के विपरीत माना।
इन टिप्पणियों के साथ न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने 9 जुलाई 2025 को दाखिल चार्जशीट तथा 30 जुलाई 2025 के संज्ञान और समन आदेश को निरस्त कर दिया। फैसले के बाद पूर्व सांसद रिजवान जहीर और रमीज नेमत को इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी राहत मिली है।