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Balrampur News: औषधीय पेनार को बचाने की कवायद, तैयार हो रहे 2,500 पौधे
Thu, 08 Oct 2026 11:52 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Thu, 08 Oct 2026 11:52 PM IST
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हरैया सतघरवा। सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग के बनकटवा रेंज के कोहड़ौरा पौधशाला में पेनार के ढाई हजार पौधे तैयार किए जा रहे हैं। यह पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है और मानव जीवन में उपयोगी है। स्थानीय बोलचाल में इसे पिरार या पिंडार भी कहा जाता है।
क्षेत्रीय वनाधिकारी शत्रुहन लाल और वन दरोगा दूधनाथ ने बताया कि जंगलों और गांवों से धीरे-धीरे गायब हो रहे बहुउपयोगी औषधीय वृक्ष पेनार को बचाने की पहल शुरू हुई है। इसके पौधे बाहर से मंगाकर कोहड़ौरा पौधशाला में तैयार किए जा रहे हैं। वन विभाग इनका रोपण वन भूमि पर कराने के साथ ग्रामीणों को भी पौधे उपलब्ध कराएगा, ताकि यह औषधीय विरासत फिर से खेत-खलिहानों और गांवों तक पहुंच सके। आयुर्वेदिक चिकित्सालय बनकटवा के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ विनय कुमार तिवारी ने बताया कि पेनार रूबिएसी फैमिली का पौधा है और पारंपरिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है।
उन्होंने बताया कि इसके फल, जड़ और छाल का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता रहा है। इसके फलों का उपयोग पाचन शक्ति बढ़ाने, शरीर को विषैले तत्वों से मुक्त करने (डिटॉक्स), पेट संबंधी समस्याओं और कृमिनाशक के रूप में किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसके कच्चे फलों की सब्जी भी बनाई जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के पेट के कीड़े और पेट दर्द जैसी समस्याओं में भी इसका पारंपरिक उपयोग किया जाता है। यह पौधा जैव विविधता संरक्षण, ग्रामीण उपयोग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (संवाद)
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क्षेत्रीय वनाधिकारी शत्रुहन लाल और वन दरोगा दूधनाथ ने बताया कि जंगलों और गांवों से धीरे-धीरे गायब हो रहे बहुउपयोगी औषधीय वृक्ष पेनार को बचाने की पहल शुरू हुई है। इसके पौधे बाहर से मंगाकर कोहड़ौरा पौधशाला में तैयार किए जा रहे हैं। वन विभाग इनका रोपण वन भूमि पर कराने के साथ ग्रामीणों को भी पौधे उपलब्ध कराएगा, ताकि यह औषधीय विरासत फिर से खेत-खलिहानों और गांवों तक पहुंच सके। आयुर्वेदिक चिकित्सालय बनकटवा के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ विनय कुमार तिवारी ने बताया कि पेनार रूबिएसी फैमिली का पौधा है और पारंपरिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है।
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उन्होंने बताया कि इसके फल, जड़ और छाल का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता रहा है। इसके फलों का उपयोग पाचन शक्ति बढ़ाने, शरीर को विषैले तत्वों से मुक्त करने (डिटॉक्स), पेट संबंधी समस्याओं और कृमिनाशक के रूप में किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसके कच्चे फलों की सब्जी भी बनाई जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के पेट के कीड़े और पेट दर्द जैसी समस्याओं में भी इसका पारंपरिक उपयोग किया जाता है। यह पौधा जैव विविधता संरक्षण, ग्रामीण उपयोग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (संवाद)
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