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गेरुआ नदी में उड़ रही रेत
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Tue, 19 Apr 2016 11:34 PM IST
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में गर्मी के कारण सूखी गेरुआ नदी में भोजन के लिए टहलते पशु।
- फोटो : अमर उजाला
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र को हरा भरा बनाने व पर्यटकों को वोटिंग की सुविधा मुहैया कराने वाली नेपाल की गेरुआ नदी रेत में तब्दील हो गई है। जिसके चलते नदी के दुर्लभ जलीय जीवों की जिंदगी को खतरा उत्पन्न हो गया है। घड़ियालों के प्रजनन का समय चल रहा है। ऐसे में प्रजनन काल भी असुरक्षित हो गया है।
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के बीच से होकर नेपाल की गेरुआ नदी बहती है। यह नदी नेपाल के दानव ताल नामक स्थान पर पहाड़ से निकलती है। नदी कोठियाघाट के निकट भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करती है। कोठियाघाट से चौधरी चरण सिंह गिरिजा बैराज तक नदी की दूरी लगभग 16 किलोमीटर है।
इसी के मध्य कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र का घना जंगल है। 03 अप्रैल से चौधरी चरण सिंह गिरिजा बैराज पर क्लोजर शुरू कर दिया गया है। जिसके चलते नदी का पानी पूरी तरह सूख गया है। कलरव करने वाली नेपाल की गेरुआ नदी रेत मानिंद नजर आ रही है। लोग पैदल नदी पार कर रहे हैं। मवेशी भी नदी की रेत पर चारे की तलाश में दिख रहे हैं।
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नदी के सूखने से जलीय जीव गैंगेटिक डाल्फिन, मगरमच्छ, घड़ियाल की जिंदगी भी खतरे में नजर आ रही है। इतना ही नहीं गर्मी में कतर्नियाघाट की सैर पर आने वाले पर्यटक भी निराश हैं। सबसे बड़ी दिक्कत गेरुआ नदी में घड़ियालों के प्रजनन की है। इस समय मादा घड़ियालों का प्रजनन काल चल रहा है।
ऐसे में पानी के अभाव में घड़ियाल नदी के निचले हिस्से में चले गए है। मादा घड़ियाल नदी के टापू पर अंडे कैसे सहेजेंगे। इस पर सवाल उठ रहे हैं। हालात यह है कि नदी में लोग इस समय पैदल आ जा रहे हैं।
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के बीच से होकर नेपाल की गेरुआ नदी बहती है। यह नदी नेपाल के दानव ताल नामक स्थान पर पहाड़ से निकलती है। नदी कोठियाघाट के निकट भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करती है। कोठियाघाट से चौधरी चरण सिंह गिरिजा बैराज तक नदी की दूरी लगभग 16 किलोमीटर है।
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इसी के मध्य कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र का घना जंगल है। 03 अप्रैल से चौधरी चरण सिंह गिरिजा बैराज पर क्लोजर शुरू कर दिया गया है। जिसके चलते नदी का पानी पूरी तरह सूख गया है। कलरव करने वाली नेपाल की गेरुआ नदी रेत मानिंद नजर आ रही है। लोग पैदल नदी पार कर रहे हैं। मवेशी भी नदी की रेत पर चारे की तलाश में दिख रहे हैं।
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नदी के सूखने से जलीय जीव गैंगेटिक डाल्फिन, मगरमच्छ, घड़ियाल की जिंदगी भी खतरे में नजर आ रही है। इतना ही नहीं गर्मी में कतर्नियाघाट की सैर पर आने वाले पर्यटक भी निराश हैं। सबसे बड़ी दिक्कत गेरुआ नदी में घड़ियालों के प्रजनन की है। इस समय मादा घड़ियालों का प्रजनन काल चल रहा है।
ऐसे में पानी के अभाव में घड़ियाल नदी के निचले हिस्से में चले गए है। मादा घड़ियाल नदी के टापू पर अंडे कैसे सहेजेंगे। इस पर सवाल उठ रहे हैं। हालात यह है कि नदी में लोग इस समय पैदल आ जा रहे हैं।