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विचार धारा पर चलता है मानवीय जीवन : आचार्य विशुद्ध सागर
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-जैन मुनि ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे
फाेटो संख्या 9
बड़ौत। दिगंबर जैनाचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि जीवन में जो जितना सहन कर लेता है, वह उतना ही ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेता है। धैर्य इंसान को भगवान बना देता है। संकटों में जो सहन कर लेता है, वह शक्तिशाली बन जाता है।
जैन मुनि ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि विचारों के अनुसार व्यक्ति का जीवन होता है। विपरीत विचारधारा ही विनाश का आधार स्तम्भ है। विचारों की पवित्रता से ही व्यक्ति उच्चता प्राप्त करता है और विचारों की निम्नता से ही व्यक्ति निम्नता को प्राप्त करता है। जो अपने विचारों को संभाल लेता है, उसका जीवन स्वयमेव संभल जाता है। जिसके मन में संकल्प-विकल्प होते हैं, कलुषता होती है, कुपित परिणाम होता है, पक्षपात होता है वह शांति से नहीं जी पाता है। कहा कि गृहस्थी के जाल में फंसा व्यक्ति, उसी जाल में मृत्यु तक रहता है। समुद्र को भुजाओं से पार करना सरल है, परन्तु गृहस्थी के जंजाल से निकलना अत्यंत कठिन है। वैराग्य पूर्वक तप साधना अत्यंत कठिन है। मनुष्य भव, उच्च कुल, उच्च विचार, उच्च-आचरण, उच्च-भक्ति, तप-संयम धारण, सल्लेखना व्रत, आत्म लीनता और समाधि उत्तरोत्तर दुर्लभ है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में विनोद एडवोकेट, अतुल जैन, धनेंद्र जैन, अरविंद मुन्ना, अशोक जैन, मनोज जैन शामिल रहे।
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फाेटो संख्या 9
बड़ौत। दिगंबर जैनाचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि जीवन में जो जितना सहन कर लेता है, वह उतना ही ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेता है। धैर्य इंसान को भगवान बना देता है। संकटों में जो सहन कर लेता है, वह शक्तिशाली बन जाता है।
जैन मुनि ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि विचारों के अनुसार व्यक्ति का जीवन होता है। विपरीत विचारधारा ही विनाश का आधार स्तम्भ है। विचारों की पवित्रता से ही व्यक्ति उच्चता प्राप्त करता है और विचारों की निम्नता से ही व्यक्ति निम्नता को प्राप्त करता है। जो अपने विचारों को संभाल लेता है, उसका जीवन स्वयमेव संभल जाता है। जिसके मन में संकल्प-विकल्प होते हैं, कलुषता होती है, कुपित परिणाम होता है, पक्षपात होता है वह शांति से नहीं जी पाता है। कहा कि गृहस्थी के जाल में फंसा व्यक्ति, उसी जाल में मृत्यु तक रहता है। समुद्र को भुजाओं से पार करना सरल है, परन्तु गृहस्थी के जंजाल से निकलना अत्यंत कठिन है। वैराग्य पूर्वक तप साधना अत्यंत कठिन है। मनुष्य भव, उच्च कुल, उच्च विचार, उच्च-आचरण, उच्च-भक्ति, तप-संयम धारण, सल्लेखना व्रत, आत्म लीनता और समाधि उत्तरोत्तर दुर्लभ है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में विनोद एडवोकेट, अतुल जैन, धनेंद्र जैन, अरविंद मुन्ना, अशोक जैन, मनोज जैन शामिल रहे।
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