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बासौली से पहले मायानगरी, अब सिंहासन तक
Updated Mon, 04 Sep 2017 01:24 AM IST
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बासौली से पहले माया नगरी, अब सिंहासन तक
बागपत। बासौली गांव के लाल ने पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनकर धाक जमाई। पुलिस की नौकरी छोड़ी तो राजनीति के गलियारों से आखिर सिंहासन तक पहुंचे। लक्ष्य पर निगाह रखने वाले डॉ. सत्यपाल सिंह की कामयाबी के किस्से गांव के लोग अपने बच्चों को सुनाते हैं। किसान परिवार में जन्में सत्यपाल सिंह की कामयाबी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा से कम नहीं।
डॉ. सत्यपाल सिंह ने गांव बासौली के साधारण किसान राम किशन के परिवार में जन्म लिया। उनके बचपन के साथी कृष्णपाल बताते हैं कि कक्षा पांच तक साथ बढ़े। सत्यपाल सिंह के जीवन पर आर्य समाज का प्रभाव है। प्रत्येक रविवार को हवन होता, वह जनेऊ धारण करते थे। बचपन में कभी चप्पल तक नहीं पहनते थे। कक्षा में हमेशा टॉप किया। शिक्षकों के प्रिय रहे। जो लक्ष्य दिया जाता, उसे हमेशा पूरा करते। डॉ. सत्यपाल सिंह के ताऊ के बेटे बालेंद्र बताते हैं कि केवल परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया। किसान के बेटे की यह कामयाबी किसी परीकथा जैसी लगती है। सादगी भरा जीवन उनकी पहचान रहा। उनकी भाषा हमेशा गांव जैसे आदमी की रही, कभी उसमें बड़े लोगों जैसा पुट नहीं रहा। जूनियर हाईस्कूल, बरनावा से आठवीं तक की शिक्षा ली। किशनपुर बराल के डीएवी इंटर कॉलेज से 12वीं की। बड़ौत के जेवी कॉलेज से एमएससी के बाद उन्होंने आईपीएस का एग्जाम दिया और वर्ष 1980 में उनका चयन हो गया। वह शिक्षकों के निकट रहे और उनका सम्मान किया।
ऐसा हैं डॉ. सत्यपाल का कुनबा
बागपत। केंद्रीय मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह के पिता रामकिशन का निधन हो चुका है। उनकी माता हुक्मवती उनके साथ रहती है। छोटा भाई हरवीर सिंह मेरठ मेें एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है, जबकि उनकी बहन वीरमति की शादी मुजफ्फरनगर के लच्छेड़ा गांव में हुई है। पत्नी अलका तोमर और बेटे-बेटी मुंबई स्थित घर में रहते हैं।
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बागपत। बासौली गांव के लाल ने पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनकर धाक जमाई। पुलिस की नौकरी छोड़ी तो राजनीति के गलियारों से आखिर सिंहासन तक पहुंचे। लक्ष्य पर निगाह रखने वाले डॉ. सत्यपाल सिंह की कामयाबी के किस्से गांव के लोग अपने बच्चों को सुनाते हैं। किसान परिवार में जन्में सत्यपाल सिंह की कामयाबी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा से कम नहीं।
डॉ. सत्यपाल सिंह ने गांव बासौली के साधारण किसान राम किशन के परिवार में जन्म लिया। उनके बचपन के साथी कृष्णपाल बताते हैं कि कक्षा पांच तक साथ बढ़े। सत्यपाल सिंह के जीवन पर आर्य समाज का प्रभाव है। प्रत्येक रविवार को हवन होता, वह जनेऊ धारण करते थे। बचपन में कभी चप्पल तक नहीं पहनते थे। कक्षा में हमेशा टॉप किया। शिक्षकों के प्रिय रहे। जो लक्ष्य दिया जाता, उसे हमेशा पूरा करते। डॉ. सत्यपाल सिंह के ताऊ के बेटे बालेंद्र बताते हैं कि केवल परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया। किसान के बेटे की यह कामयाबी किसी परीकथा जैसी लगती है। सादगी भरा जीवन उनकी पहचान रहा। उनकी भाषा हमेशा गांव जैसे आदमी की रही, कभी उसमें बड़े लोगों जैसा पुट नहीं रहा। जूनियर हाईस्कूल, बरनावा से आठवीं तक की शिक्षा ली। किशनपुर बराल के डीएवी इंटर कॉलेज से 12वीं की। बड़ौत के जेवी कॉलेज से एमएससी के बाद उन्होंने आईपीएस का एग्जाम दिया और वर्ष 1980 में उनका चयन हो गया। वह शिक्षकों के निकट रहे और उनका सम्मान किया।
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ऐसा हैं डॉ. सत्यपाल का कुनबा
बागपत। केंद्रीय मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह के पिता रामकिशन का निधन हो चुका है। उनकी माता हुक्मवती उनके साथ रहती है। छोटा भाई हरवीर सिंह मेरठ मेें एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है, जबकि उनकी बहन वीरमति की शादी मुजफ्फरनगर के लच्छेड़ा गांव में हुई है। पत्नी अलका तोमर और बेटे-बेटी मुंबई स्थित घर में रहते हैं।
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