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पानी की जमकर हो रही बर्बादी
Azamgarh,
Updated Mon, 08 May 2017 12:03 AM IST
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जल संक
स्वच्छ पेयजल की आस में बड़े-बड़े जारों में भरे पानी का इस्तेमाल घर-घर होने लगा है। यह जार उन्हें मिनरल प्लांट संचालकों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। लोगों की बढ़ती डिमांड और कम लागत में होने वाले ज्यादा फायदे को देखते हुए हर गली में एक मिनरल वाटर प्लांट खुल गया है। इनके द्वारा धड़ल्ले से प्राकृतिक जल का अवैध रूप से दोहन किया जा रहा है। क्योंकि इनमें से किसी के पास प्लांट संचालित करने का लाइसेंस नहीं है। वहीं खाद्य विभाग खुला पानी होने के कारण इस पर कार्रवाई करने से बच रहा हैै।
तरह-तरह के केमिकल का प्रयोग होने से धरती के नीचे का जल भी प्रदूषित हो चुका है। जिसके कारण आए दिन लोग तरहतरह की बिमारियों से पीड़ित रहते हैं। इससे बचने के लिए लोगों द्वारा मिनरल वाटर का प्रयोग किया जाता है। लोग इस पानी को स्वच्छ मानकर इसका सेवन करते हैं। लेकिन यह कितना शुद्ध है इसकी जांच करने वाला कोई नहीं है। कम लागत में अच्छी कमाई का जरिया बन चुका यह धंधा पूरे जिले में अपनी जड़ें जमा चुका है।
शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक मिनरल वाटर प्लांट लग चुके हैं। इनके द्वारा तेेजी से भूजल का दोहन किया जाता है। एक लीटर शुद्घ जल बनाने के लिए मिनरल वाटर बनाने वाले चार लीटर पानी को नाली में बहा देते हैं। इसे रोकने वाला कोई नहीं है। जिला प्रशासन भी इस ओर से आंखे मूंदे हुए है। जबकि इनके पास कोई लाइसेंस नहीं है। ऐसे लोगों पर लगाम कसने के लिए जिम्मेदार खाद्य विभाग कार्रवाई करने के बजाए खुला पानी होने का हवाला देकर कार्रवाई से किनारा कर लेता है। जबकि नगर क्षेत्र में एक-एक मिनरल वाटर प्लांट का संचालक प्रतिदिन 20-20 लीटर के 100 से 150 जारों की सप्लाई करता है। लगन केे सीजन में इसकी डिमांड और कई गुना बढ़ जाती है।
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तरह-तरह के केमिकल का प्रयोग होने से धरती के नीचे का जल भी प्रदूषित हो चुका है। जिसके कारण आए दिन लोग तरहतरह की बिमारियों से पीड़ित रहते हैं। इससे बचने के लिए लोगों द्वारा मिनरल वाटर का प्रयोग किया जाता है। लोग इस पानी को स्वच्छ मानकर इसका सेवन करते हैं। लेकिन यह कितना शुद्ध है इसकी जांच करने वाला कोई नहीं है। कम लागत में अच्छी कमाई का जरिया बन चुका यह धंधा पूरे जिले में अपनी जड़ें जमा चुका है।
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शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक मिनरल वाटर प्लांट लग चुके हैं। इनके द्वारा तेेजी से भूजल का दोहन किया जाता है। एक लीटर शुद्घ जल बनाने के लिए मिनरल वाटर बनाने वाले चार लीटर पानी को नाली में बहा देते हैं। इसे रोकने वाला कोई नहीं है। जिला प्रशासन भी इस ओर से आंखे मूंदे हुए है। जबकि इनके पास कोई लाइसेंस नहीं है। ऐसे लोगों पर लगाम कसने के लिए जिम्मेदार खाद्य विभाग कार्रवाई करने के बजाए खुला पानी होने का हवाला देकर कार्रवाई से किनारा कर लेता है। जबकि नगर क्षेत्र में एक-एक मिनरल वाटर प्लांट का संचालक प्रतिदिन 20-20 लीटर के 100 से 150 जारों की सप्लाई करता है। लगन केे सीजन में इसकी डिमांड और कई गुना बढ़ जाती है।
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