खेल दिवस पर खासः आजमगढ़ के स्पोर्ट्स स्टेडियम में बैडमिंटन कोच नहीं, फिर भी पैदा हुए अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी
आजमगढ़ से निकलकर देश और विदेश में अपना और जनपद का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों की पूरी फौज है। शिव शर्मा और शांतनु शर्मा जैसे बैडमिंटन खिलाड़ियों ने इसी स्टेडियम से बैडमिंटन का ककहरा सीखा और आज देश और विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
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आजमगढ़ का एकमात्र सुखदेव पहलवान स्पोर्ट्स स्टेडियम अपनी एक अलग पहचान रखता है। इस स्टेडियम ने कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को तराशा है। लेकिन कोरोना के कारण विगत दो सालों से कोच की तैनाती न होने से खिलाड़ी का भविष्य अधर में है। क्योंकि खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने वाला कोई नहीं है।
आजमगढ़ से निकलकर देश और विदेश में अपना और जनपद का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों की पूरी फौज है। सुविधाओं के अभाव में भी यह खिलाड़ी सुखदेव पहलवान स्पोर्ट्स स्टेडियम में निखर कर सबको अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं। लेकिन आज अधिकारियों की उपेक्षा के कारण यह स्टेडियम उजड़ सा गया है।
स्टेडियम की आउटफील्ड हल्की बारिश में ही तालाब में तब्दील हो जाती है। जिसके कारण फुटबॉल, हॉकी, हैंडबाल, क्रिकेट आदि खेल नहीं हो पाते हैं। शिव शर्मा और शांतनु शर्मा जैसे बैडमिंटन खिलाड़ियों ने इसी स्टेडियम से बैडमिंटन का ककहरा सीखा और आज देश और विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
पूर्व में यहां जिलाधिकारी रहे सुहास एलवाई यहां रहते हुए पैरालंपिक गेम में स्वर्ण पदक जीतने में कामयाब रहे। बैडमिंटन कोर्ट भी दुर्दशा का शिकार हो गया है। मरम्मत न होने से इसमें जगह-जगह से पानी टपकता है।
वर्ष 2008 में लगभग 76 लाख रुपये की लागत से जिम्नेजियम हॉल का निर्माण कराया गया। कई सालों बाद इसका लोकार्पण हुआ लेकिन इसमें कुश्ती के लिए बनाई गई लकड़ी की फ्लोरिंग टूट गई थी। जिस पर खेल तो दूर पैदल चलना भी दूभर हो गया था।
जिसे पूर्व आरएसओ मुद्रिका पाठक ने अपने प्रयास से लकड़ी की फ्लोरिंग को हटाकर फर्श बनवा दिया और इसी में जिम करने की मशीनें भी लगवा दी। लगभग 50 लाख रुपये की लागत से बना बास्केटबाल का सिंथेटिक कोर्ट जगह-जगह से सड़ चुका है। स्टेडियम से बाहर खिलाड़ियों के रहने के लिए छात्रावास बनाया गया।
उप क्रीड़ाधिकारी राज नरायन प्रसाद ने कहा कि एक समस्या कोच की है। कोरोना के कारण संविदा प्रशिक्षकों की तैनाती नहीं हुई। हाल में कुछ कोच की तैनाती हुई लेकिन दो को छोड़कर किसी ने ज्वाइन नहीं किया। दूसरी समस्या बच्चों के घर से आने की है। जिसके कारण वह समय पर कोचिंग में नहीं पहुंच पाते हैं। इसके लिए अभिभावक जिम्मेदार हैं। स्टेडियम पांच बजे खुल जाता है लेकिन बच्चे सात बजे तक आते हैं।