पशुधन पर पड़ी तकनीक की मार
जैसे-जैसे टेक्नोलाजी का प्रचलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पशुधन का दायरा भी सिमटता जा रहा है। पहले जहां लोग खेती के लिए बैल रखते थे, वहीं अब ट्रैक्टर रख रहे हैं। जिनके पास ट्रैक्टर खरीदने के पैसे नहीं हैं, वह लोग किराए पर ट्रैक्टर बुलाकर जुताई और बुआई कर रहे हैं। जिस दरवाजे पर कभी गाय, भैंस और बैल हुआ करते थे। आज उस दरवाजे पर सिर्फ गाय या भैंस दिखाई देती है। इसका परिणाम है कि पशुओं से प्राप्त होने वाले लाभ समाप्त हो गए हैं।
खेतों में गोबर की खाद नहीं पड़ रही है जिसके कारण खेतों की उर्वरा शक्ति कमजोर हो रही है। रासायनिक खादों के प्रयोग से हानिकारक तत्व लोगों के पेट तक पहुंच कर उन्हें बीमार कर रहे हैं। अगर सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2012 की जनगणना के अनुसार जनपद में गोवंश 539773, भैंसवंश 480385, भेंड़ 14462, बकरी 311608, सूकर 25773 और अन्य पशुओं की संख्या 1746 हैं। वहीं कुक्कुट 589877 है।
जनपद में गायों की संख्या तो स्थिर है लेकिन भैसों की संख्या कम हुई है। बैलों की संख्या कम होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यांत्रिक उपकरण हैं। क्योंकि इनके आने से लोगों ने बैलों को रखना बंद कर दिया। विभिन्न यांत्रिक उपकरणों के प्रयोग के कारण पशुओं का चारा भी कम हुआ है जिसके कारण लोगों ने पशुओं को पालना कम किया है।