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Azamgarh News: 2500 बंदरों को पकड़ने में 4.87 लाख खर्च फिर भी हर दिन 35 से ज्यादा लोग हो रहे घायल

Wed, 01 Jul 2026 12:16 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 01 Jul 2026 12:16 AM IST
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It cost 4.87 lakh to catch 2,500 monkeys, yet more than 35 people are getting injured every day
सिविल लाइन मुहल्ले में बंदरों का झुंड। संवाद
आजमगढ़।
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शहर हो या फिर ग्रामीण क्षेत्र बंदरों के उत्पात से हर कोई परेशान है। जिले में हर दिन 35 से ज्यादा लोगों को बंदर काट कर घायल कर रहे हैं। हालांकि नगर पालिका इनकी धरपकड़ के लिए अभी तक कोई मजबूत योजना नहीं बन सकी है। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी प्रशांत कुमार ने बताया कि बीते साल 2500 बंदरों को पकड़ने में 4.87 लाख रुपये खर्च कर दिए। यानि एक बंदर के पकड़ने में 195 रुपये खर्च किए गए। नगर पालिका का कहना है कि इन बंदरों को पकड़कर सोनभद्र और मिर्जापुर के जंगलों में छोड़ा गया था। लेकिन फिर से ये बंदर शहर और गांवों में आ गए हैं। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 130 से 140 लोग एंटी रेबिज इंजेक्शन लगवाने के लिए आ रहे हैं।
लोहे और एल्युमिनयिम की जाली में खर्च हुए 40 हजार से डेढ़ लाख रुपये

बंदरों से बचाव के लिए बालकनी, सीढ़ियों, खुली रेलिंग, छत तक जाने वाले रास्तों पर लोहे और एल्युमिनियम की जाली भवन स्वामी लगवा रहे हैं। बंदरों के डर से बच्चे, बुजुर्ग और महिलाओं का छत पर चढ़ना मुश्किल हो गया है। बंदर सूख रहे कपड़े फाड़ दे रहे हैं। फल-सब्जियां, खाने-पीने का सामान और गमलों में लगे पौधों को नुकसान पहुंचा रहे है। सिधारी, सिविल लाइन, रेलवे स्टेशन, चौक, ब्रह्मस्थान, जिला अस्पताल आदि स्थानों पर सबसे ज्यादा समस्या है।
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60 दिन में 120 से ज्यादा लोग घायल

बरदह बाजार में बीते 60 दिन में 120 से ज्यादा लोग बंदरों के काटने से घायल हो चुके हैं। बाजार के ही विवेक तिवारी, संजना, विनय विश्वकर्मा ने बताया कि बाजार से खाने-पीने का सामान खरीदकर घर तक ले जाना मुश्किल हो गया है। वन विभाग और पंचायत विभाग एक दूसरे पर बंदरों के पकड़ने की जिम्मेदारी थोप रहे हैं। दोनों विभागों के बीच जिम्मेदारी तय नहीं होने से समस्या जस की तस बनी है।
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अतरौलिया में 25 बच्चे हो चुके हैं घायल

अतरौलिया में बीते दो महीने में अभी तक बंदरों के काटने से 25 बच्चे घायल हो चुके हैं। कस्बे के पवन सोनी, महेश गुप्ता, कन्हैया सोनकर ने बताया कि बंदर हाथ से सामान छीनकर भाग जाते हैं। रेंजर वीर बहादुर सिंह ने बताया कि हमारे विभाग को बंदरों को पकड़ने के लिए कोई आदेश नहीं आया है। अभी इसकी जिम्मेदारी नगर पंचायत और ग्राम पंचायत ही है।
कपड़े सूखाने के लिए छत पर करनी पड़ती है निगरानी

महराजगंज कस्बे में हर जगह बंदर झुंड बनाकर बैठे रहते हैं। महेश मौर्य, शिवनाथ ने बताया कि छत पर सूखने के लिए गेहूं, कपड़ा या अन्य कोई सामान रखा जाता है तो डंडा लेकर उसकी निगरानी करनी पड़ती है।

बंदरों के उत्पात की जानकारी कई मुहल्ले से आई है। बंदरों को पकड़ने की कार्ययोजना बनाई जा रही है। जल्द ही टेंडर कराकर इनको पकड़ने का काम शुरू करा दिया जाएगा। बंदरों को पकड़वाकर दूर के जंगलों में छोड़ा जाएगा। - प्रशांत कुमार, अधिशासी अधिकारी।
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