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Azamgarh News: कार्बाइड से पके आम न खाएं, लिवर और पेट को बचाएं
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आजमगढ़। जिले में आम का सीजन जोरों पर है, लेकिन फलों के राजा को जल्दी पकाने के लिए प्रतिबंधित रसायन कार्बाइड का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। कार्बाइड से पके आम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं, जो लिवर और पेट की समस्याओं का कारण बन सकते हैं। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि प्राकृतिक रूप से पके आम ही खाने चाहिए। रंग-रूप देखकर ललचाए नहीं, हो सकती है परेशानी
बाजार में कार्बाइड से पके आम अपनी चमक और रंग से ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। लोग बिना सोचे-समझे इन्हें खरीद रहे हैं। सहायक खाद्य सुरक्षा आयुक्त सुशील कुमार मिश्रा के अनुसार, कार्बाइड से पके आम की पहचान आसान है। आम को पानी भरे बर्तन में डालें, अगर वह तैरने लगे तो यह रसायन से पकाया गया है।
इसके अलावा, हल्का हरा रंग, झुर्रियां, हरे धब्बे या काटने पर अधपका और लाल-पीला रंग दिखना भी कार्बाइड के इस्तेमाल का संकेत है। वर्तमान में बाजार में 40 से 50 रुपये किग्रा की दर से आम मिल रहा है। वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. आरके कुशवाहा ने बताया कि कैल्शियम कार्बाइड पानी में घुलकर एसिटिलीन गैस बनाता है, जो कृत्रिम रूप से आम को पकाता है।
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यह गैस मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकती है। इसके सेवन से पेट और लिवर संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि आम को कार्बाइड की बजाय इथलीन से पकाना सुरक्षित है।
30-40 घंटे में पक जाता है कच्चा आम: फल कारोबारी कच्चे आम को कार्बाइड लगाकर मात्र 30-40 घंटे में पका लेते हैं, जिससे बाजार में मांग के अनुरूप आपूर्ति हो जाती है। जिले के कई कस्बों में आधा दर्जन गोदामों में यह काम बड़े पैमाने पर हो रहा है। प्रतिबंध के बावजूद कार्बाइड की आसान उपलब्धता पर जिम्मेदारों की उदासीनता सवाल उठा रही है।
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बाजार में कार्बाइड से पके आम अपनी चमक और रंग से ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। लोग बिना सोचे-समझे इन्हें खरीद रहे हैं। सहायक खाद्य सुरक्षा आयुक्त सुशील कुमार मिश्रा के अनुसार, कार्बाइड से पके आम की पहचान आसान है। आम को पानी भरे बर्तन में डालें, अगर वह तैरने लगे तो यह रसायन से पकाया गया है।
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इसके अलावा, हल्का हरा रंग, झुर्रियां, हरे धब्बे या काटने पर अधपका और लाल-पीला रंग दिखना भी कार्बाइड के इस्तेमाल का संकेत है। वर्तमान में बाजार में 40 से 50 रुपये किग्रा की दर से आम मिल रहा है। वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. आरके कुशवाहा ने बताया कि कैल्शियम कार्बाइड पानी में घुलकर एसिटिलीन गैस बनाता है, जो कृत्रिम रूप से आम को पकाता है।
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यह गैस मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकती है। इसके सेवन से पेट और लिवर संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि आम को कार्बाइड की बजाय इथलीन से पकाना सुरक्षित है।
30-40 घंटे में पक जाता है कच्चा आम: फल कारोबारी कच्चे आम को कार्बाइड लगाकर मात्र 30-40 घंटे में पका लेते हैं, जिससे बाजार में मांग के अनुरूप आपूर्ति हो जाती है। जिले के कई कस्बों में आधा दर्जन गोदामों में यह काम बड़े पैमाने पर हो रहा है। प्रतिबंध के बावजूद कार्बाइड की आसान उपलब्धता पर जिम्मेदारों की उदासीनता सवाल उठा रही है।