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Azamgarh News: एक नाव के भरोसे 12 गांवों की 25 हजार की आबादी
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खरैलिया ढ़ाला पर नाव से नदी पार करते ग्रामीण। संवाद
सगड़ी तहसील के देवारा क्षेत्र में सरयू के बढ़ते जलस्तर से लोगों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। हालात खराब होते जा रहे हैं। वहीं महुला गढ़वल बांध के उत्तरी ओर स्थित बहुत से गांव ऐसे हैं, जहां निवास करने वाली हजारों की आबादी नाव की कमी से एक ही नाव के सहारे आवागमन कर रही है।
महुला गढ़वल बांध के उत्तर छोटी सरयू नदी के खरैलिया ढाला से उत्तर 12 गांव की 25000 की आबादी रहती है। इन गांवों में रहने वालों के लिए जीवनयापन की हर जरूरी चीज छोटी सरयू नदी के पार मिलती है।
नदी पार करने के लिए इन लोगों के पास सबसे नजदीकी साधन एक नाव है। यह सिर्फ नाव नहीं, यहां के लोगों के लिए स्कूल वाहन, एंबुलेंस और जन परिवहन का साधन भी है।
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जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर महुला गढ़वल बांध का अजगरा सोनौरा इलाका है। यहां से छोटी सरयू गुजरती है। यह छोटी नदी बाढ़ के समय विकराल हो जाती है।
रौनापार चांद पट्टी के समृद्ध बाजार, अच्छे स्कूल, कॉलेज, चिकित्सक, बैंक और अस्पताल हैं। दूसरी तरफ मानिकपुर, डीके राजा, बेलहिया, सोनौरा, धुसवां, झनझनपुर, झगरहवा, अजगरा, अभ्भन पट्टी, मगरवी जैसे गांव हैं, जहां करीब 25000 लोग बसते हैं।
इन गांव की तरफ से पगडंडी मार्ग से सबसे नजदीकी बाजार रौनापार चांद पट्टी पड़ता है, जो करीब 7 से 10 किलोमीटर दूर है। ऐसे में यहां के लोगों को राशन, बर्तन, कपड़े, दवा, इलाज, बैंक संबंधी काम के लिए रौनापार चांद पट्टी जाना पड़ता है।
दिन हो या रात, सामान्य जरूरत हो या आपातकालीन स्थिति, सभी की पूर्ति के लिए रौनापार चांद पट्टी से ही पूर्ति होती है।
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बोले लोग
- यहां तीन पीढ़ी से हम नाव चला रहे हैं। हमारे बाबा रामबुझ और पिता फूल बदन भी नाव चलाते थे और यही जीवन यापन का साधन है। गेहूं की फसल कटाई होने के बाद गांव के लोग एक-दो किलो दे दिया करते हैं। -बेचू माझी, सोनौरा।
- नाव न होती तो पढ़ाई नहीं होती। साइकिल से घर से तो निकल कर आते हैं, पर यहां नाव ही सहारा होता है और हम लोग बंधे से होकर स्कूल जाते हैं। -बेबी यादव, छात्रा।
बाजार, अस्पताल हो या स्कूल जाने का, मात्र नाव ही एक साधन है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। हम लोगों ने इसके लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से कहा, पर उपेक्षा का शिकार बन गया। -जयराम, सोनौरा।
यह बाप-दादा से हम लोग झेलते आ रहे हैं। अब आदत सी पड़ गई और कोई सुनने वाला नहीं है। रात में बीमार होने पर चारपाई से लाद कर लाते हैं या गाड़ी से लाते हैं तो यहां नाव ही सहारा होता है। -लाल बचन, सोनौरा।
- फोटो संख्या- यहां कई बार रपटा पुल बनाने के लिए हम लोगों ने प्रयास किया, पर कोई जनप्रतिनिधि सुन नहीं रहा। चुनाव के समय लोग आते हैं, वादा करके चले जाते हैं। -रामबचन राय, सोनौरा।
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हमारे पास नाव की पर्याप्त व्यवस्था है। स्थानीय चौकी पर जो लेखपाल आदि मौजूद हैं, उन्हें निर्देश दिया गया है कि जहां भी जितनी नाव की जरूरत है, उसे लगाएं। अगर खरैलिया ढाले पर नाव की कमी है, तो वहां तत्काल नाव लगाने का निर्देश दिया जा रहा है। -संजीव कुमार राय, एसडीएम सगड़ी।
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महुला गढ़वल बांध के उत्तर छोटी सरयू नदी के खरैलिया ढाला से उत्तर 12 गांव की 25000 की आबादी रहती है। इन गांवों में रहने वालों के लिए जीवनयापन की हर जरूरी चीज छोटी सरयू नदी के पार मिलती है।
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नदी पार करने के लिए इन लोगों के पास सबसे नजदीकी साधन एक नाव है। यह सिर्फ नाव नहीं, यहां के लोगों के लिए स्कूल वाहन, एंबुलेंस और जन परिवहन का साधन भी है।
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जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर महुला गढ़वल बांध का अजगरा सोनौरा इलाका है। यहां से छोटी सरयू गुजरती है। यह छोटी नदी बाढ़ के समय विकराल हो जाती है।
रौनापार चांद पट्टी के समृद्ध बाजार, अच्छे स्कूल, कॉलेज, चिकित्सक, बैंक और अस्पताल हैं। दूसरी तरफ मानिकपुर, डीके राजा, बेलहिया, सोनौरा, धुसवां, झनझनपुर, झगरहवा, अजगरा, अभ्भन पट्टी, मगरवी जैसे गांव हैं, जहां करीब 25000 लोग बसते हैं।
इन गांव की तरफ से पगडंडी मार्ग से सबसे नजदीकी बाजार रौनापार चांद पट्टी पड़ता है, जो करीब 7 से 10 किलोमीटर दूर है। ऐसे में यहां के लोगों को राशन, बर्तन, कपड़े, दवा, इलाज, बैंक संबंधी काम के लिए रौनापार चांद पट्टी जाना पड़ता है।
दिन हो या रात, सामान्य जरूरत हो या आपातकालीन स्थिति, सभी की पूर्ति के लिए रौनापार चांद पट्टी से ही पूर्ति होती है।
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बोले लोग
- यहां तीन पीढ़ी से हम नाव चला रहे हैं। हमारे बाबा रामबुझ और पिता फूल बदन भी नाव चलाते थे और यही जीवन यापन का साधन है। गेहूं की फसल कटाई होने के बाद गांव के लोग एक-दो किलो दे दिया करते हैं। -बेचू माझी, सोनौरा।
- नाव न होती तो पढ़ाई नहीं होती। साइकिल से घर से तो निकल कर आते हैं, पर यहां नाव ही सहारा होता है और हम लोग बंधे से होकर स्कूल जाते हैं। -बेबी यादव, छात्रा।
बाजार, अस्पताल हो या स्कूल जाने का, मात्र नाव ही एक साधन है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। हम लोगों ने इसके लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से कहा, पर उपेक्षा का शिकार बन गया। -जयराम, सोनौरा।
यह बाप-दादा से हम लोग झेलते आ रहे हैं। अब आदत सी पड़ गई और कोई सुनने वाला नहीं है। रात में बीमार होने पर चारपाई से लाद कर लाते हैं या गाड़ी से लाते हैं तो यहां नाव ही सहारा होता है। -लाल बचन, सोनौरा।
- फोटो संख्या- यहां कई बार रपटा पुल बनाने के लिए हम लोगों ने प्रयास किया, पर कोई जनप्रतिनिधि सुन नहीं रहा। चुनाव के समय लोग आते हैं, वादा करके चले जाते हैं। -रामबचन राय, सोनौरा।
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हमारे पास नाव की पर्याप्त व्यवस्था है। स्थानीय चौकी पर जो लेखपाल आदि मौजूद हैं, उन्हें निर्देश दिया गया है कि जहां भी जितनी नाव की जरूरत है, उसे लगाएं। अगर खरैलिया ढाले पर नाव की कमी है, तो वहां तत्काल नाव लगाने का निर्देश दिया जा रहा है। -संजीव कुमार राय, एसडीएम सगड़ी।