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Ayodhya News: खरना के साथ 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू
Thu, 07 Nov 2024 12:25 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Thu, 07 Nov 2024 12:25 AM IST
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छठ पर्व को लेकर गुदड़ीबाजार में पूजन के दौरान मौजूद भक्तगण।-संवाद
अयोध्या। छठ महापर्व के दूसरे दिन बुधवार को खरना पर महिलाओं ने निर्जला व्रत रखा। शाम को स्नान कर व्रती महिलाओं ने मिट्टी के चूल्हे पर साठी के चावल और गुड़ से रसियाव (खीर) व रोटी का प्रसाद बनाया। सूर्यदेव व छठी मैया को आराधना कर प्रसाद ग्रहण किया। वहीं रात भर समूह में उगा हे सूरज देव, भइल भिनसरवा... जैसे छठी मैया के गीत गाए।
बृहस्पतिवार को व्रती महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शाम को यमुना किनारे घाट पर डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन करेंगी। लोक आस्था के पर्व छठ पर बुधवार को व्रती महिलाओं ने सुबह से लेकर शाम तक निर्जला व्रत रखा। दोपहर में शुद्ध ईंट व मिट्टी से नया चूल्हा बनाया गया। दिन भर ठेकुआ, खजूर (मीठा खस्ता) के लिए आटे को तैयार करवाया।
शाम के समय छठी मैया के लिए पूजा का प्रसाद रसियाव (खीर) व रोटी का प्रसाद ग्रहण करने के बाद परिजनों को प्रसाद का वितरण किया गया। वासुदेव घाट निवासी शांति देवी ने बताया कि बृहस्पतिवार को व्रती व अन्य महिलाएं स्नान के बाद मिट्टी के चूल्हे पर ठेकुआ व खजूर बनाएंगी।
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शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद घर पर कोसी भरी जाएगी। शुक्रवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ चार दिवसीय पर्व का समापन होगा। वहीं शहर से लेकर देहात तक सरयू के घाटों पर दिन भर तैयारियां चलती रहीं।
क्या है कोशी भरने की परंपरा
छठ मइया से मांगी गई मनौती पूरी होने के बाद कोशी भरी जाती है। इसके लिए मिट्टी के बड़े कलश जिस पर छह दीपक होते हैं, चारों ओर गन्ने के 12 पौधों का समूह बनाकर उसे छतरी का स्वरूप देते हैं। इसके बाद आंगन में ही इसकी पूजा की जाती है। सुबह नदी किनारे गन्ने की छतरी बनाकर उसके नीचे मिट्टी के छह दीपकों वाला बड़ा कलश और मिट्टी का ही हाथी रखकर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है।
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बृहस्पतिवार को व्रती महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शाम को यमुना किनारे घाट पर डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन करेंगी। लोक आस्था के पर्व छठ पर बुधवार को व्रती महिलाओं ने सुबह से लेकर शाम तक निर्जला व्रत रखा। दोपहर में शुद्ध ईंट व मिट्टी से नया चूल्हा बनाया गया। दिन भर ठेकुआ, खजूर (मीठा खस्ता) के लिए आटे को तैयार करवाया।
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शाम के समय छठी मैया के लिए पूजा का प्रसाद रसियाव (खीर) व रोटी का प्रसाद ग्रहण करने के बाद परिजनों को प्रसाद का वितरण किया गया। वासुदेव घाट निवासी शांति देवी ने बताया कि बृहस्पतिवार को व्रती व अन्य महिलाएं स्नान के बाद मिट्टी के चूल्हे पर ठेकुआ व खजूर बनाएंगी।
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शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद घर पर कोसी भरी जाएगी। शुक्रवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ चार दिवसीय पर्व का समापन होगा। वहीं शहर से लेकर देहात तक सरयू के घाटों पर दिन भर तैयारियां चलती रहीं।
क्या है कोशी भरने की परंपरा
छठ मइया से मांगी गई मनौती पूरी होने के बाद कोशी भरी जाती है। इसके लिए मिट्टी के बड़े कलश जिस पर छह दीपक होते हैं, चारों ओर गन्ने के 12 पौधों का समूह बनाकर उसे छतरी का स्वरूप देते हैं। इसके बाद आंगन में ही इसकी पूजा की जाती है। सुबह नदी किनारे गन्ने की छतरी बनाकर उसके नीचे मिट्टी के छह दीपकों वाला बड़ा कलश और मिट्टी का ही हाथी रखकर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है।