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अयोध्या मामले में गृह मंत्रालय पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय
Updated Mon, 14 Jan 2013 09:19 PM IST
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अयोध्या
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में विवादास्पद राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद स्थल पर अस्थायी व्यवस्था में
सुधार के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
खटखटाया है। स्थल को तीन भाग में बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर
सर्वोच्च अदालत ने 9 मई, 2011 को रोक लगा दी थी। साथ ही विवादित स्थान पर
यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इस आदेश के चलते अस्थायी व्यवस्था
में भी किसी तरह का बदलाव करना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है, जिसके
चलते गृह मंत्रालय ने शीर्षस्थ अदालत का रुख किया है।
सुप्रीम कोर्ट की चेंबर पीठ ने गृह मंत्रालय की ओर से दाखिल आवेदन पर 28 जनवरी को सुनवाई करने को कहा है। मंत्रालय ने आग्रह किया है कि विवादित स्थल पर हाईकोर्ट का आदेश आने से पहले अस्थायी तौर पर तमाम व्यवस्थाएं की गई थीं। हाईकोर्ट के 13 सितंबर, 2010 के आदेश के बाद मामला शीर्षस्थ अदालत में पहुंचा और यथा स्थिति का आदेश जारी हुआ। इस अंतराल में कई व्यवस्थाओं में सुधार की जरूरत आ गई है।
विवादित स्थल पर लगे तिरपाल फट चुके हैं, कई अन्य चीजों में बदलाव की जरूरत है। याद रहे कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय हिंदू महासभा, जमियत उलेमा ए हिंद और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने का आदेश जारी किया था।
गृह मंत्रालय ने शीर्षस्थ अदालत से अस्थायी व्यवस्था में सुधार के लिए अनुमति मांगते हुए स्पष्ट किया है कि यथा स्थिति के आदेश की वजह से उसकी ओर से कोई भी गतिविधि या कार्य विवादित क्षेत्र में नहीं किया गया है। सर्वोच्च अदालत ने मई, 2011 में विवादास्पद ढांचे से सटी उस 67 एकड़ भूमि पर कोई धार्मिक गतिविधि न किए जाने का आदेश दिया था जो केंद्र सरकार की ओर से अधिग्रहीत की गई है। साथ ही कहा था कि बाकी भूमि पर यथा स्थिति बनाए रखी जानी चाहिए।
शीर्षस्थ अदालत के इस आदेश से विवादास्पद स्थल में रामलला के अस्थायी मंदिर में पूजा सामान्य तरीके से जारी रही, क्योंकि पूजा पहले से की जा रही थी। गौरतलब है कि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उस 2.77 एकड़ भूमि को तीन भागों में बांटकर मुसलमानों, हिंदुओं और निर्मोही अखाड़ा को देने का आदेश दिया था जिस पर कभी विवादास्पद ढांचा खड़ा था।
क्या था मामला :-
विवादित स्थल को तीन भाग में बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सर्वोच्च अदालत ने 9 मई, 2011 को रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद ढांचे से सटी उस 67 एकड़ भूमि पर कोई धार्मिक गतिविधि न किए जाने का आदेश दिया था जो केंद्र सरकार की ओर से अधिग्रहीत की गई है। साथ ही विवादित स्थान पर यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इस आदेश के चलते अस्थायी व्यवस्था में भी किसी तरह का बदलाव करना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है, जिसके चलते गृह मंत्रालय ने शीर्षस्थ अदालत का रुख किया है।
सुप्रीम कोर्ट की चेंबर पीठ ने गृह मंत्रालय की ओर से दाखिल आवेदन पर 28 जनवरी को सुनवाई करने को कहा है। मंत्रालय ने आग्रह किया है कि विवादित स्थल पर हाईकोर्ट का आदेश आने से पहले अस्थायी तौर पर तमाम व्यवस्थाएं की गई थीं। हाईकोर्ट के 13 सितंबर, 2010 के आदेश के बाद मामला शीर्षस्थ अदालत में पहुंचा और यथा स्थिति का आदेश जारी हुआ। इस अंतराल में कई व्यवस्थाओं में सुधार की जरूरत आ गई है।
विवादित स्थल पर लगे तिरपाल फट चुके हैं, कई अन्य चीजों में बदलाव की जरूरत है। याद रहे कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय हिंदू महासभा, जमियत उलेमा ए हिंद और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने का आदेश जारी किया था।
गृह मंत्रालय ने शीर्षस्थ अदालत से अस्थायी व्यवस्था में सुधार के लिए अनुमति मांगते हुए स्पष्ट किया है कि यथा स्थिति के आदेश की वजह से उसकी ओर से कोई भी गतिविधि या कार्य विवादित क्षेत्र में नहीं किया गया है। सर्वोच्च अदालत ने मई, 2011 में विवादास्पद ढांचे से सटी उस 67 एकड़ भूमि पर कोई धार्मिक गतिविधि न किए जाने का आदेश दिया था जो केंद्र सरकार की ओर से अधिग्रहीत की गई है। साथ ही कहा था कि बाकी भूमि पर यथा स्थिति बनाए रखी जानी चाहिए।
शीर्षस्थ अदालत के इस आदेश से विवादास्पद स्थल में रामलला के अस्थायी मंदिर में पूजा सामान्य तरीके से जारी रही, क्योंकि पूजा पहले से की जा रही थी। गौरतलब है कि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उस 2.77 एकड़ भूमि को तीन भागों में बांटकर मुसलमानों, हिंदुओं और निर्मोही अखाड़ा को देने का आदेश दिया था जिस पर कभी विवादास्पद ढांचा खड़ा था।
क्या था मामला :-
विवादित स्थल को तीन भाग में बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सर्वोच्च अदालत ने 9 मई, 2011 को रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद ढांचे से सटी उस 67 एकड़ भूमि पर कोई धार्मिक गतिविधि न किए जाने का आदेश दिया था जो केंद्र सरकार की ओर से अधिग्रहीत की गई है। साथ ही विवादित स्थान पर यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इस आदेश के चलते अस्थायी व्यवस्था में भी किसी तरह का बदलाव करना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है, जिसके चलते गृह मंत्रालय ने शीर्षस्थ अदालत का रुख किया है।