फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Auraiya News ›   The torture was right, but the flame of patriotism was not extinguished

औरैयाः यातनाएं सहीं, पर नहीं बुझी थी देशभक्ति की ज्वाला

Sat, 13 Aug 2022 11:57 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 13 Aug 2022 11:57 PM IST
विज्ञापन
The torture was right, but the flame of patriotism was not extinguished
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रभुदयाल। - फोटो : AURAIYA
औरैया। ऐरवाकटरा के प्रभु दयाल ने वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन में क्षेत्रीय युवाओं को एकजुट किया। आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर यातनाएं दी। इसके बावजूद उनके सीने में धधक रही आजादी की आग मंद नहीं पड़ी और वह भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने को आगे बढ़ते गए।
विज्ञापन

भारत प्रेरणा मंच के महासचिव पूर्व सैनिक अविनाश अग्निहोत्री बताते हैं कि ब्लाक ऐरवाकटरा की ग्राम सभा एरवाटिकुर में वैश्य परिवार में 1886 में जन्में प्रभुदयाल ने महात्मा गांधी का अनुयायी बन तहसील बिधूना के ग्रामीण क्षेत्रों में पैदल घूम-घूम कर स्वतंत्रता की अलख जगाई। इस बीच आजादी की लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। संपूर्ण देश गांधी के नेतृत्व में खड़ा था। सन 1921 के असहयोग आंदोलन में तहसील बिधूना में सैकड़ों साथियों को तैयार किया। इस आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
विज्ञापन

माह सितंबर 1921 में ब्रिटिश शासन ने उनको गिरफ्तार कर एरवाकटरा थाने में यातनाएं दी। इसके बाद उनको केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ भेज दिया गया। 28 सितंबर 1921 को एक वर्ष की कैद हुई। सजा काट कर वापस आए तब और अधिक उत्साह के साथ स्वतंत्रता आंदोलन को समर्पित हो गए। स्वतंत्रता उनका महान आशय था। इसलिए आम जनता उनको महाशय प्रभु दयाल के नाम से जानने लगी।
विज्ञापन
विज्ञापन

घर-परिवार, पिता-पुत्र, नाते-रिश्ते सभी को त्याग कर आजादी को समर्पित हो गए। वर्ष 1921, 1922 व 1942 आदि सभी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। देश आजाद होने के बाद वर्ष 1973 में फर्रुखाबाद के स्वामी परमानंद आर्य सन्यासी द्वारा सन्यास ग्रहण कर विधिवत सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। महाशय प्रभु दयाल से प्रभु दयाल वानप्रस्थ बने। बाद में स्वामी प्रेमानंद बने। संपूर्ण जीवन खद्दर पहनना, चरखा चलाना, सादा जीवन उच्च विचार का एक आदर्श जीवन लक्ष्य की पूर्ति करते हुए 97 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हो गए। उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ हुई। आज भी लोग उनके आंदोलन की चर्चाएं करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed