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Auraiya News: सबूत के अभाव में हत्या के चार आरोपी बरी
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औरैया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश मयंक चौहान की अदालत ने 12 साल पुराने हत्या और साक्ष्य छिपाने के मामले में फैसला सुनाया है। अदालत ने चारों अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया। अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मध्य प्रदेश के दतिया जिले के गांव दिगुवां निवासी मनोज कुमार राठौर (30) अजीतमल थाना क्षेत्र में कपड़े की फेरी लगाते थे। वह अपनी बिक्री के रुपये और सामान अजीतमल के के गांव गढ़ा निवासी रविंद्र और संजीव राजपूत के पास रखते थे। 1 अप्रैल 2014 को मनोज की धारदार हथियार से हत्या कर शव जंगल में फेंक दिया गया था। मृतक के भाई अशोक कुमार की तहरीर पर रविंद्र, संजीव, प्रेमबहादुर और हरिश्चंद्र के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था।
मुख्य साक्षी अरविंद कुमार राठौर के बयानों में कई खामियां पाई गईं। उसने स्वीकार किया कि तहरीर अपनी मर्जी से नहीं लिखी थी और वह मृतक के साथ नहीं रहता था। मुख्य वादी अशोक कुमार को साक्ष्य के लिए प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे रंजिश या लालच के कारण की पुष्टि नहीं हो सकी। अदालत ने उच्चतम न्यायालय के नज़ीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य मुकदमों में दोषसिद्धि के लिए कड़ियों की शृंखला मजबूत होनी चाहिए। चूंकि अभियुक्तों को घटना से ठीक पहले मृतक के साथ देखा जाना या उनसे कोई आला-ए-कत्ल या चोरी का सामान बरामद होना साबित नहीं हो सका, सत्र न्यायाधीश मयंक चौहान ने रविंद्र, संजीव, प्रेमबहादुर और हरिश्चंद्र को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
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मध्य प्रदेश के दतिया जिले के गांव दिगुवां निवासी मनोज कुमार राठौर (30) अजीतमल थाना क्षेत्र में कपड़े की फेरी लगाते थे। वह अपनी बिक्री के रुपये और सामान अजीतमल के के गांव गढ़ा निवासी रविंद्र और संजीव राजपूत के पास रखते थे। 1 अप्रैल 2014 को मनोज की धारदार हथियार से हत्या कर शव जंगल में फेंक दिया गया था। मृतक के भाई अशोक कुमार की तहरीर पर रविंद्र, संजीव, प्रेमबहादुर और हरिश्चंद्र के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था।
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मुख्य साक्षी अरविंद कुमार राठौर के बयानों में कई खामियां पाई गईं। उसने स्वीकार किया कि तहरीर अपनी मर्जी से नहीं लिखी थी और वह मृतक के साथ नहीं रहता था। मुख्य वादी अशोक कुमार को साक्ष्य के लिए प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे रंजिश या लालच के कारण की पुष्टि नहीं हो सकी। अदालत ने उच्चतम न्यायालय के नज़ीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य मुकदमों में दोषसिद्धि के लिए कड़ियों की शृंखला मजबूत होनी चाहिए। चूंकि अभियुक्तों को घटना से ठीक पहले मृतक के साथ देखा जाना या उनसे कोई आला-ए-कत्ल या चोरी का सामान बरामद होना साबित नहीं हो सका, सत्र न्यायाधीश मयंक चौहान ने रविंद्र, संजीव, प्रेमबहादुर और हरिश्चंद्र को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
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