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Auraiya News: साक्ष्यों के अभाव में एससी/एसटी के चार दोषमुक्त

Sun, 11 Oct 2026 12:53 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sun, 11 Oct 2026 12:53 AM IST
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Four acquitted in SC/ST case due to lack of evidence.
औरैया। विशेष अदालत एससी/एसटी एक्ट ने थाना दिबियापुर के एक मामले में फैसला सुनाया है। पीठासीन अधिकारी विकास गोस्वामी की अदालत ने पर्याप्त साक्ष्यों और गवाहों के अभाव में अभियुक्तगण महेंद्र सिंह, धनपाल सिंह, जगपाल सिंह उर्फ छोटे और मंजू देवी को मारपीट, गाली-गलौज, एससी-एसटी एक्ट और चोरी के आरोपों से दोषमुक्त करार दिया। साथ ही वादी मुकदमा के खिलाफ अलग से प्रकीर्ण वाद दर्ज करने का आदेश दिया है।
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वादी मुकदमा राजेंद्र कुमार ने न्यायालय के समक्ष प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया था कि 16 अक्टूबर 2013 की शाम को विपक्षीगण लाठी-डंडों व हथियारों के साथ काशीराम कॉलोनी के पास बन रहे प्लॉट पर आए। आरोप था कि उन्होंने प्लॉट की दीवार गिरा दी, जातिसूचक गालियां, जान से मारने की धमकी दी और प्लॉट पर रखी सीमेंट, फावड़े, तसला व पाइप आदि सामान चोरी कर ले गए। पुलिस ने अदालत के आदेश पर मामला दर्ज कर चार्जशीट दाखिल की थी, जिस पर विचारण के बाद अदालत ने यह निर्णय सुनाया।
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विचारण के दौरान मुख्य परीक्षा में वादी मुकदमा राजेंद्र कुमार ने घटना का समर्थन किया था, लेकिन अपनी क्रॉस एग्जामिनेशन में वह अपने बयान से पूरी तरह पलट गए और उन्होंने स्वीकार किया कि घटना के समय वह मौके पर नहीं थे और न ही अभियुक्तों ने उनके सामने कोई मारपीट या गाली-गलौज की थी। मुख्य गवाह के होस्टाइल हो जाने और अन्य ठोस साक्ष्यों के अभाव में अभियोजन आरोप साबित करने में असफल रहा।
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साथ ही डीएम से कहा है कि इस मामले में एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई मुआवजा सहायता राशि दी गई हो, तो उसकी नियमानुसार वसूली की जाए।
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आठ साल से जेल में बंद आरोपी को मिली जमानत
संवाद न्यूज एजेंसी
औरैया। फफूंद थाना में जावेद के खिलाफ हत्या, डकैती समेत अन्य धाराओं में मुकदमा है। अभी हाल में उसके द्वारा कोर्ट में द्वितीय जमानत प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया गया था। अधिवक्ता के माध्यम से दिए गए तर्क में बताया गया कि प्रार्थी वर्ष 2018 से एक अन्य मामले में जेल चला गया था और तब से जिला कारागार कानपुर व वर्तमान में इटावा कारागार में बंद है। लंबी अवधि तक जेल में रहने के कारण वह नियत तारीखों पर अदालत में पेश नहीं हो सका, जिसके चलते उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट और कुर्की की कार्रवाई जारी हो गई थी। मूल पत्रावली से उसकी पत्रावली अलग किए जाने के बाद उसे तलब किया गया था।

सुनवाई के दौरान अपर जिला शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए दलील दी कि आरोपी की मंशा मुकदमे की कार्यवाही को अनावश्यक रूप से लंबित रखने की है। वर्ष 2014 में ही आरोप विरचित किए जा चुके हैं और मामले में तीन गवाहों की गवाही भी हो चुकी है। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आरोपी को राहत दे दी गई।
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