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Amroha News: दीपदान कर अपनों को किया याद, मुख्य स्नान आज
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तिगरीधाम (अमरोहा)।
कार्तिक पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर बृहस्पतिवार शाम श्रद्धालुओं ने दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान किया। जिससे तिगरी का गंगा तट जगमगा उठे। गंगा किनारे ऐसा प्रतीत होने लगा मानों आसमान में टिमटिमाने वाले तारे जमीन पर उतर आएं हों। यह सिलसिला देर रात तक जारी रहा। हमेशा के लिए दूर जा चुके अपनों के लिए दीपदान करते ही लोगों की आंखें नम हो गईं। इसके चलते घाटों का माहौल गमगीन हो गया। वहीं, कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्थान शुक्रवार को होगा। इसके बाद श्रद्धालु घर वापस लौटने लगेंगे।
तिगरीधाम पर गंगा किनारे लगे ऐतिहासिक मेले की 11 नवंबर को विधिवत शुरुआत हुई थी, जिसका शुक्रवार को कार्तिक पूर्णिमा पर मुख्य स्नान के साथ समापन होगा। हालांकि, पिछले कई दिनों से लोग गंगा किनारे तंबू बनाकर रह रहे है। जिससे में गंगा किनारे तंबुओं का शहर बस गया है। पिछले कई दिनों से गंगा किनारे पड़ाव डालकर रह रहे श्रद्धालु विभिन्न धार्मिक आयोजन करने के साथ गंगा में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। मेले का सबसे अहम पर्व चतुर्दशी को मनाया जाता है, जिसमें लोग सालभर में अपने मृतक अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए गंगा में दीपदान करते हैं।
बृहस्पतिवार शाम सूर्यास्त होते ही तिगरी गंगा घाट पर श्रद्धालु दीपदान के लिए पहुंच गए। नम आंखों से अपने पूर्वजों के लिए दीपदान किया। यह सिलसिला देर रात तक जारी रहा। अपने सगे संबंधी और परिजनों से बिछड़े लोगों को याद कर लोगों की आंखें भर आईं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट आसमान में तारों जैसा दिखाई देने लगा। कुछ श्रद्धालु तिगरी गंगा घाट पहुंच पाए। इसके बाद दीपदान किया। दीपदान के बाद पुरोहितों को वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा आदि का दान भी किया।
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दीपदान का महत्व
मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था। तब से यह परंपरा चल रही है। कार्तिक पूर्णिमा पर तिगरी धाम लगने वाले ऐतिहासिक मेले के मुख्य स्नान से एक दिन चतुर्दशी पर अपने पितरों का तर्पण करते हैं। यह दीपदान वही लोग करते हैं, जिनके सगे संबंधी एक वर्ष के अंदर उन्हें छोड़कर परम पिता परमेश्वर की शरण में चले गए हैं। गंगा में दीपदान करने से मृत आत्माओं को शांति मिलती है।
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कार्तिक पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर बृहस्पतिवार शाम श्रद्धालुओं ने दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान किया। जिससे तिगरी का गंगा तट जगमगा उठे। गंगा किनारे ऐसा प्रतीत होने लगा मानों आसमान में टिमटिमाने वाले तारे जमीन पर उतर आएं हों। यह सिलसिला देर रात तक जारी रहा। हमेशा के लिए दूर जा चुके अपनों के लिए दीपदान करते ही लोगों की आंखें नम हो गईं। इसके चलते घाटों का माहौल गमगीन हो गया। वहीं, कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्थान शुक्रवार को होगा। इसके बाद श्रद्धालु घर वापस लौटने लगेंगे।
तिगरीधाम पर गंगा किनारे लगे ऐतिहासिक मेले की 11 नवंबर को विधिवत शुरुआत हुई थी, जिसका शुक्रवार को कार्तिक पूर्णिमा पर मुख्य स्नान के साथ समापन होगा। हालांकि, पिछले कई दिनों से लोग गंगा किनारे तंबू बनाकर रह रहे है। जिससे में गंगा किनारे तंबुओं का शहर बस गया है। पिछले कई दिनों से गंगा किनारे पड़ाव डालकर रह रहे श्रद्धालु विभिन्न धार्मिक आयोजन करने के साथ गंगा में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। मेले का सबसे अहम पर्व चतुर्दशी को मनाया जाता है, जिसमें लोग सालभर में अपने मृतक अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए गंगा में दीपदान करते हैं।
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बृहस्पतिवार शाम सूर्यास्त होते ही तिगरी गंगा घाट पर श्रद्धालु दीपदान के लिए पहुंच गए। नम आंखों से अपने पूर्वजों के लिए दीपदान किया। यह सिलसिला देर रात तक जारी रहा। अपने सगे संबंधी और परिजनों से बिछड़े लोगों को याद कर लोगों की आंखें भर आईं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट आसमान में तारों जैसा दिखाई देने लगा। कुछ श्रद्धालु तिगरी गंगा घाट पहुंच पाए। इसके बाद दीपदान किया। दीपदान के बाद पुरोहितों को वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा आदि का दान भी किया।
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दीपदान का महत्व
मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था। तब से यह परंपरा चल रही है। कार्तिक पूर्णिमा पर तिगरी धाम लगने वाले ऐतिहासिक मेले के मुख्य स्नान से एक दिन चतुर्दशी पर अपने पितरों का तर्पण करते हैं। यह दीपदान वही लोग करते हैं, जिनके सगे संबंधी एक वर्ष के अंदर उन्हें छोड़कर परम पिता परमेश्वर की शरण में चले गए हैं। गंगा में दीपदान करने से मृत आत्माओं को शांति मिलती है।