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मनरेगा से जुड़े लोग नहीं करा सकेंगे संबंधियों की फर्मों के नाम पर भुगतान
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सिंहपुर (अमेठी)। शासन की ओर से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में भ्रष्टाचार रोकने की कोशिश लगातार जारी है। पूर्व में एक आदेश के जरिए फर्जी मजदूरी भुगतान पर अंकुश लगाने के बाद शासन ने नए आदेश में सामग्री आपूर्ति के लिए ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक, पंचायत कर्मी व पंचायत सदस्य तथा अन्य जुड़े कर्मी या उनके संबंधियों की फर्म पर सामग्री या अन्य वेंडर भुगतान कराने पर रोक लगा दी है।
अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह द्वारा जारी यह आदेश पत्र विकास विभाग को मिल चुका है। पत्र में कहा गया है कि मनरेगा योजना में अब मनरेगा से जुड़े किसी सदस्य व उसके संबंधियों की मनरेगा योजना में पंजीकृत फर्मों के खातों में किसी भी सामग्री, वेंडर कार्य, स्टेशनरी इत्यादि का भुगतान नहीं होगा।
पत्र में यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक तथा मनरेगा से जुड़े अन्य कर्मी स्वयं अपनी या अपने संबंधियों के नाम कागजी फर्म बनाकर सरकारी धन को ठिकाने लगा रहे हैं। मनरेगा में पनपे इस भ्रष्टाचार पर वार होते ही मनरेगा से जुड़े लोगों में हड़कंप मच गया है। 22 मार्च को जारी हुए इस पत्र के 24 मार्च को सिंहपुर ब्लॉक में पत्र पहुंचते ही अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
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सिर्फ अभिलेखों में अधिकांश फर्म
सिंहपुर ब्लॉक में लगभग आधी ग्राम पंचायतों के प्रधान, रोजगार सेवक किसी अन्य कर्मी या किसी अन्य संबंधी के नाम पर फर्म पंजीकृत हैं। इन्हीं फर्मों के नाम पर ग्राम पंचायतों तथा मनरेगा के सामग्री का भुगतान होता रहता है। बड़ी संख्या में मनरेगा की सामग्री भुगतान हेतु पत्रावलियां फीड भी थीं लेकिन इस पत्र के आते ही सभी पत्रावलियों में फर्म बदलने का काम शुरू हो गया है। मनरेगा योजना में अभी तक जो फर्म व्यक्तिगत रूप से मनरेगा कार्मिकों द्वारा लगाई गई थीं उनमें अधिकांश कागजी फर्म थीं। लगभग एक दर्जन ग्राम प्रधानों, रोजगार सेवकों या उनके संबंधियों की सामग्री आपूर्ति वाली फर्म हैं शेष फर्म सिर्फ कागजी ही हैं।
आखिर अपनी फर्मों पर क्यों चाहते हैं भुगतान
एक जानकर ने मनरेगा से जुड़े जनप्रतिनिधि व कार्मिक द्वारा अपनी ही फर्म में मनरेगा सामग्री या अन्य वेंडर का पैसा लेने का कारण बताया। कहा, एक तो भुगतान सीधे अपने खाते में आता है। ट्रेडर्स के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। अधिकांश सामग्री में बाजार की कीमत और सरकारी कीमत में अंतर है। मूल्य अंतर रिबेट के लिए भी ट्रेडर्स के चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
तकनीकी सहायक की सेवा करने के बाद कुछ ऐसा भी भुगतान चढ़ जाता है जिनका भुगतान तो बन जाता है लेकिन खरीद नहीं होती। वह भी मापन बुक (एम बी) में चढ़वा लिए जाते हैं। वह पैसा भी अपने फर्म के खाते में आ जाता है। यानी किसी प्रकार का धन डूबने का जोखिम नहीं रहता और वास्तव में जिन फर्मों से सामग्री ली जाती है उनसे भी मोल भाव आसान हो जाता है।
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अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह द्वारा जारी यह आदेश पत्र विकास विभाग को मिल चुका है। पत्र में कहा गया है कि मनरेगा योजना में अब मनरेगा से जुड़े किसी सदस्य व उसके संबंधियों की मनरेगा योजना में पंजीकृत फर्मों के खातों में किसी भी सामग्री, वेंडर कार्य, स्टेशनरी इत्यादि का भुगतान नहीं होगा।
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पत्र में यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक तथा मनरेगा से जुड़े अन्य कर्मी स्वयं अपनी या अपने संबंधियों के नाम कागजी फर्म बनाकर सरकारी धन को ठिकाने लगा रहे हैं। मनरेगा में पनपे इस भ्रष्टाचार पर वार होते ही मनरेगा से जुड़े लोगों में हड़कंप मच गया है। 22 मार्च को जारी हुए इस पत्र के 24 मार्च को सिंहपुर ब्लॉक में पत्र पहुंचते ही अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
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सिर्फ अभिलेखों में अधिकांश फर्म
सिंहपुर ब्लॉक में लगभग आधी ग्राम पंचायतों के प्रधान, रोजगार सेवक किसी अन्य कर्मी या किसी अन्य संबंधी के नाम पर फर्म पंजीकृत हैं। इन्हीं फर्मों के नाम पर ग्राम पंचायतों तथा मनरेगा के सामग्री का भुगतान होता रहता है। बड़ी संख्या में मनरेगा की सामग्री भुगतान हेतु पत्रावलियां फीड भी थीं लेकिन इस पत्र के आते ही सभी पत्रावलियों में फर्म बदलने का काम शुरू हो गया है। मनरेगा योजना में अभी तक जो फर्म व्यक्तिगत रूप से मनरेगा कार्मिकों द्वारा लगाई गई थीं उनमें अधिकांश कागजी फर्म थीं। लगभग एक दर्जन ग्राम प्रधानों, रोजगार सेवकों या उनके संबंधियों की सामग्री आपूर्ति वाली फर्म हैं शेष फर्म सिर्फ कागजी ही हैं।
आखिर अपनी फर्मों पर क्यों चाहते हैं भुगतान
एक जानकर ने मनरेगा से जुड़े जनप्रतिनिधि व कार्मिक द्वारा अपनी ही फर्म में मनरेगा सामग्री या अन्य वेंडर का पैसा लेने का कारण बताया। कहा, एक तो भुगतान सीधे अपने खाते में आता है। ट्रेडर्स के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। अधिकांश सामग्री में बाजार की कीमत और सरकारी कीमत में अंतर है। मूल्य अंतर रिबेट के लिए भी ट्रेडर्स के चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
तकनीकी सहायक की सेवा करने के बाद कुछ ऐसा भी भुगतान चढ़ जाता है जिनका भुगतान तो बन जाता है लेकिन खरीद नहीं होती। वह भी मापन बुक (एम बी) में चढ़वा लिए जाते हैं। वह पैसा भी अपने फर्म के खाते में आ जाता है। यानी किसी प्रकार का धन डूबने का जोखिम नहीं रहता और वास्तव में जिन फर्मों से सामग्री ली जाती है उनसे भी मोल भाव आसान हो जाता है।