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Amethi News: आरक्षण पर टिकीं उम्मीदवारों की नजरें
Fri, 18 Jul 2025 01:09 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Fri, 18 Jul 2025 01:09 AM IST
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अमेठी सिटी। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की सरगर्मी के साथ ही गांवों में आरक्षण को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। जनगणना वर्ष 2021 में नहीं हो पाने के चलते आरक्षण चक्र पुराने आंकड़ों पर आधारित रहेगा, जिससे बड़ी संख्या में ग्राम पंचायतों और वार्डों की स्थिति बदल सकती है। उम्मीदवारों ने आरक्षण पर पैनी नजर लगा रखी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक आरक्षण निर्धारण का आधार जनसंख्या और पिछली आरक्षण स्थिति होती है। जनगणना समय पर हो जाती तो नया आरक्षण चक्र वर्ष 2021 की जनगणना पर आधारित होता। कोविड काल में जनगणना स्थगित हो जाने से अब 2010, 2015 और 2021 में हुए चुनावों की आरक्षण स्थिति को ध्यान में रखते हुए नई सूची बनेगी। आरक्षण चक्र में रोटेशन का स्पष्ट नियम है कि लगातार दो या तीन बार एक ही वर्ग को आरक्षित रहीं सीटों को बदल दिया जाता है।
खासतौर पर महिला, अनुसूचित जाति व अन्य पिछड़ा वर्ग की सीटों का आरक्षण अब नए समीकरण के साथ तय होगा। आरक्षण बदलाव की संभावना ने उम्मीदवारों और मौजूदा प्रतिनिधियों में उलझन पैदा कर दी है। कई ग्राम प्रधान जो विकास कार्यों के आधार पर पुनः दावेदारी कर रहे हैं, वे अब इस आशंका से घिर गए हैं कि कहीं उनकी सीट का आरक्षण न बदल जाए। बीते चुनाव में जिन वार्डों को सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित किया गया था, वहां इस बार आरक्षित वर्ग का दावा तय माना जा रहा है। इससे चुनावी समीकरण तो प्रभावित होंगे ही, गांव की सियासत भी नए मोड़ पर पहुंच सकती है।
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विशेषज्ञों के मुताबिक आरक्षण निर्धारण का आधार जनसंख्या और पिछली आरक्षण स्थिति होती है। जनगणना समय पर हो जाती तो नया आरक्षण चक्र वर्ष 2021 की जनगणना पर आधारित होता। कोविड काल में जनगणना स्थगित हो जाने से अब 2010, 2015 और 2021 में हुए चुनावों की आरक्षण स्थिति को ध्यान में रखते हुए नई सूची बनेगी। आरक्षण चक्र में रोटेशन का स्पष्ट नियम है कि लगातार दो या तीन बार एक ही वर्ग को आरक्षित रहीं सीटों को बदल दिया जाता है।
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खासतौर पर महिला, अनुसूचित जाति व अन्य पिछड़ा वर्ग की सीटों का आरक्षण अब नए समीकरण के साथ तय होगा। आरक्षण बदलाव की संभावना ने उम्मीदवारों और मौजूदा प्रतिनिधियों में उलझन पैदा कर दी है। कई ग्राम प्रधान जो विकास कार्यों के आधार पर पुनः दावेदारी कर रहे हैं, वे अब इस आशंका से घिर गए हैं कि कहीं उनकी सीट का आरक्षण न बदल जाए। बीते चुनाव में जिन वार्डों को सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित किया गया था, वहां इस बार आरक्षित वर्ग का दावा तय माना जा रहा है। इससे चुनावी समीकरण तो प्रभावित होंगे ही, गांव की सियासत भी नए मोड़ पर पहुंच सकती है।
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