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कठिन परिस्थितियों में भी दुश्मनों का छुड़ा दिया था पसीना
अमर उजाला ब्यूरो/अंबेडकरनगर
Updated Mon, 25 Jul 2016 11:29 PM IST
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लेफ्टीनेंट कर्नल (रि.) संतबख्श।
- फोटो : अमर उजाला
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कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लेने में जिले के एक सपूत लेफ्टीनेंट कर्नल (रि.) संतबख्श सिंह ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने न सिर्फ तमाम दुश्मनों को मार गिराया, बल्कि दुश्मनों से लोहा ले रहे सैनिकों का बढ़-चढ़कर उत्साहवर्धन भी किया।
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यादों के झरोखे से बहादुर सपूत ने बताया कि उस समय परिस्थिति बड़ी कठिन थी। कारण यह कि दुश्मन पहाड़ियों के ऊपर थे। उनकी संख्या की भी जानकारी नहीं थी। इसके बाद भी आखिरकार विजय भारतीय सेना की ही हुई।
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भीटी तहसील अन्तर्गत जैतूपुर गांव निवासी शमशेर सिंह के बड़े पुत्र लेफ्टीनेंट कर्नल (रि.) संतबख्श सिंह ने कारगिल युद्ध में बढ़ चढ़कर भाग लिया था। श्री सिंह बताते हैं कि वर्ष 1966 में जबलपुर में सिग्नल रेजीमेंट में रेडियो मैकेनिक जवान के पद पर उनकी तैनाती हुई।
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1973 में कमीशन के बाद सेकेंड लेफ्टीनेंट के पद से होते हुए लेफ्टीनेंट कर्नल तक का सफर तय किया। कारगिल युद्ध से पूर्व श्री सिंह की तैनाती भारत-पाकिस्तान बॉर्डर डेराबाबा नानक में तैनाती थी। युद्ध के दौरान उन्हें बंकर में तैनात कर दिया गया।
वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त हुए श्री सिंह ने कहा कि यह एक ऐसा युद्ध था, जिसमें दुश्मनों की संख्या, उनकी स्थिति के बारे में सही जानकारी ही नहीं थी। कारण यह कि दुश्मन पहाड़ियों के ऊपर थे और भारतीय सैनिक नीचे।
अत्याधुनिक हथियारों से लैस दुश्मन ऊपर से लगातार हमलावर थे। उनकी संख्या के बारे में ही जानकारी नहीं हो सकी। जानकारी होने के बाद भारतीय सैनिकों ने दुश्मनों का लोहा लेना शुरू किया और पराजित किया।
बताया कि उस समय चल रहे युद्ध के चलते उनके छोटे भाई उदयप्रताप सिंह जो कि राजपूत रेजीमेंट में कारगिल के वादीपुर में नायब हवालदार के पद पर तैनात थे, उनसे बात नहीं हो पा रही थी। इससे उन्हें उनकी काफी चिंता थी, लेकिन विजय हासिल करने के बाद उन्होंने भाई से वार्ता की।