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Ambedkar Nagar News: मशीन पड़ी खराब तो कहीं कार्टेज ही नदारद
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अंबेडकरनगर। जिले के सरकारी अस्पतालों में टीबी (क्षय रोगियों) का इलाज सिर्फ लक्षण पर हो रहा है। अस्पताल में जांच के लिए मौजूद सीबी नॉट मशीन लंबे समय से खराब पड़ी हैं जबकि ट्रूनैट मशीन की कार्टेज खत्म है। गहन जांच न हो पाने के कारण चिकित्सकों को भी बीमारी की श्रेणी जाने बिना सिर्फ माइक्रो स्कोपिक जांच के सहारे ही मरीजों का इलाज करने को विवश होना पड़ रहा है। ऐसे में निजी लैब में महंगी जांच कराने से मरीजों की जेब भी ढीली हो रही है।
क्षय रोग के इलाज के लिए नियमित अंतराल पर विशेष अभियान तो चलाया जाता है लेकिन टीबी मरीजों से जुड़ी जांच की सुविधा को बेहतर बनाने में पूरी ढिलाई बरती जा रही है। इसके चलते ही ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच से जुड़ी टीबी नैट व सीबी नॉट मशीन खराब पड़ी है। इन मशीनों से होने वाली जांच में ही पता चलता है कि मरीज में टीबी रोग किस श्रेणी तक पहुंचा है। इसके आधार पर ही उसके लिए दवा का निर्धारण कर बेहतर इलाज होता है।
जांच मशीन खराब पड़ी होने से बीमारी की श्रेणी की जानकारी के लिए मरीजों को मजबूरी में निजी पैथॉलोजी सेंटर का सहारा लेकर अपनी जेब भी ढीली करना पड़ रही है। टीबी के उपचार के लिए की मरीजों को फर्स्ट लाइन और द्वितीय लाइन श्रेणी में चिह्नित कर दवा का निर्धारण होता है। मौजूदा समय में जिले में कुल 2668 टीबी मरीज चिह्नित हैं। इनमें से फर्स्ट लाइन के 2510 तथा द्वितीय लाइन अर्थात क्रिटिकल श्रेणी के 158 टीबी मरीज हैं।
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सीवी नॉट मशीन जिला अस्पताल व सीएचसी जलालपुर में स्थापित है। सीएचसी जलालपुर में पिछले दो वर्ष जबकि जिला अस्पताल में लगभग ढाई महीने से मशीन खराब है। इसके अलावा राजकीय मेडिकल कॉलेज सद्दरपुर, सीएचसी टांडा, पीएचसी हंसवर व रामनगर में स्थापित चार ट्रूुनैट मशीनों का कॉर्टेज भी बीते डेढ़ सप्ताह से खत्म हो जाने के कारण मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। ऐसे में इलाज के लिए आने वाले टीबी रोगियों का इलाज माइक्रोस्कोपिक जांच से मिलने वाली लक्षण आधारित रिपोर्ट के सहारे ही करना पड़ रहा है।
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क्षय रोग के इलाज के लिए नियमित अंतराल पर विशेष अभियान तो चलाया जाता है लेकिन टीबी मरीजों से जुड़ी जांच की सुविधा को बेहतर बनाने में पूरी ढिलाई बरती जा रही है। इसके चलते ही ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच से जुड़ी टीबी नैट व सीबी नॉट मशीन खराब पड़ी है। इन मशीनों से होने वाली जांच में ही पता चलता है कि मरीज में टीबी रोग किस श्रेणी तक पहुंचा है। इसके आधार पर ही उसके लिए दवा का निर्धारण कर बेहतर इलाज होता है।
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जांच मशीन खराब पड़ी होने से बीमारी की श्रेणी की जानकारी के लिए मरीजों को मजबूरी में निजी पैथॉलोजी सेंटर का सहारा लेकर अपनी जेब भी ढीली करना पड़ रही है। टीबी के उपचार के लिए की मरीजों को फर्स्ट लाइन और द्वितीय लाइन श्रेणी में चिह्नित कर दवा का निर्धारण होता है। मौजूदा समय में जिले में कुल 2668 टीबी मरीज चिह्नित हैं। इनमें से फर्स्ट लाइन के 2510 तथा द्वितीय लाइन अर्थात क्रिटिकल श्रेणी के 158 टीबी मरीज हैं।
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सीवी नॉट मशीन जिला अस्पताल व सीएचसी जलालपुर में स्थापित है। सीएचसी जलालपुर में पिछले दो वर्ष जबकि जिला अस्पताल में लगभग ढाई महीने से मशीन खराब है। इसके अलावा राजकीय मेडिकल कॉलेज सद्दरपुर, सीएचसी टांडा, पीएचसी हंसवर व रामनगर में स्थापित चार ट्रूुनैट मशीनों का कॉर्टेज भी बीते डेढ़ सप्ताह से खत्म हो जाने के कारण मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। ऐसे में इलाज के लिए आने वाले टीबी रोगियों का इलाज माइक्रोस्कोपिक जांच से मिलने वाली लक्षण आधारित रिपोर्ट के सहारे ही करना पड़ रहा है।