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Ambedkar Nagar News: सत्य के मार्ग पर चलने वाला होता है सदा विजयी
Sat, 30 Aug 2025 12:38 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
Updated Sat, 30 Aug 2025 12:38 AM IST
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26.कथा प्रवाचक श्रीनिवास दास वेंदाती।संवाद
आलापुर (अंबेडकरनगर)। क्षेत्र के मसेना मिर्जापुर के शांति विहार कॉलोनी में चातुर्मास श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। प्रवाचक श्रीनिवास दास वेदांती ने शुक्रवार को सीता स्वयंवर के प्रसंगों का रसपान कराया।
प्रवाचक ने कहा कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला सदा विजयी होता है। राम का व्यवहार, उनकी नम्रता और धर्मनिष्ठा यह बताती है कि सत्य और धर्म का पालन करने वाला कभी पराजित नहीं होता। प्रवाचक ने कहा कि जब प्रभु श्रीराम ने परशुरामजी के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उनकी शंका का निवारण किया, तब परशुराम सभा से प्रस्थान कर गए। उसी क्षण आकाश से देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, नगाड़े गूंजे और पूरा जनकपुर उत्सवमय हो उठा। उस समय राजा जनक के मुख पर ऐसी प्रसन्नता थी मानो वर्षों से संचित खजाना हाथ लग गया हो। सीता भी भयमुक्त होकर आनंद से भर उठीं। जनक ने विश्वामित्र को प्रणाम कर निवेदन किया कि उनकी कृपा से प्रभु राम ने यह कार्य सिद्ध किया। इस पर मुनि ने कहा कि यद्यपि धनुष भंग होते ही विवाह संपन्न हो चुका है और देवता साक्षी हैं, फिर भी परंपरा व वेद-विधान के अनुसार कार्य करना उचित होगा।
उन्होंने जनक को अवधपुरी संदेश भेजने की प्रेरणा दी। दूत अयोध्या पहुंचे और राजा दशरथ को विवाह का निमंत्रण सौंपा, पूरी अयोध्या नगरी उल्लास से भर उठी। राजा दशरथ संदेश सुनकर भावविह्वल हो गए, सभा में नृत्य करने लगे और उनकी आंखों से आनंदाश्रु झरने लगे। उन्होंने देवाधिदेव महादेव का स्मरण कर बार-बार कृतज्ञता व्यक्त की। दूतों से समाचार मिलते ही भरत और शत्रुघ्न दौड़कर सभा में आए। राजा दशरथ ने जनक की चिट्ठी सबके समक्ष पढ़ी। भरत-शत्रुघ्न समाचार सुनकर हर्षित हुए और जनकपुर की स्थिति के बारे में जानकारी ली। तत्पश्चात राजा दशरथ ने मंत्रिमंडल और गुरु वशिष्ठ से विचार-विमर्श कर विवाह यात्रा की तैयारियां प्रारंभ कर दीं।
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प्रवाचक ने कहा कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला सदा विजयी होता है। राम का व्यवहार, उनकी नम्रता और धर्मनिष्ठा यह बताती है कि सत्य और धर्म का पालन करने वाला कभी पराजित नहीं होता। प्रवाचक ने कहा कि जब प्रभु श्रीराम ने परशुरामजी के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उनकी शंका का निवारण किया, तब परशुराम सभा से प्रस्थान कर गए। उसी क्षण आकाश से देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, नगाड़े गूंजे और पूरा जनकपुर उत्सवमय हो उठा। उस समय राजा जनक के मुख पर ऐसी प्रसन्नता थी मानो वर्षों से संचित खजाना हाथ लग गया हो। सीता भी भयमुक्त होकर आनंद से भर उठीं। जनक ने विश्वामित्र को प्रणाम कर निवेदन किया कि उनकी कृपा से प्रभु राम ने यह कार्य सिद्ध किया। इस पर मुनि ने कहा कि यद्यपि धनुष भंग होते ही विवाह संपन्न हो चुका है और देवता साक्षी हैं, फिर भी परंपरा व वेद-विधान के अनुसार कार्य करना उचित होगा।
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उन्होंने जनक को अवधपुरी संदेश भेजने की प्रेरणा दी। दूत अयोध्या पहुंचे और राजा दशरथ को विवाह का निमंत्रण सौंपा, पूरी अयोध्या नगरी उल्लास से भर उठी। राजा दशरथ संदेश सुनकर भावविह्वल हो गए, सभा में नृत्य करने लगे और उनकी आंखों से आनंदाश्रु झरने लगे। उन्होंने देवाधिदेव महादेव का स्मरण कर बार-बार कृतज्ञता व्यक्त की। दूतों से समाचार मिलते ही भरत और शत्रुघ्न दौड़कर सभा में आए। राजा दशरथ ने जनक की चिट्ठी सबके समक्ष पढ़ी। भरत-शत्रुघ्न समाचार सुनकर हर्षित हुए और जनकपुर की स्थिति के बारे में जानकारी ली। तत्पश्चात राजा दशरथ ने मंत्रिमंडल और गुरु वशिष्ठ से विचार-विमर्श कर विवाह यात्रा की तैयारियां प्रारंभ कर दीं।
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