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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Significant ruling by the Allahabad High Court, IPC Sections 420 and 409 cannot be invoked simultaneously

High Court : इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, एक साथ नहीं लगायी जा सकती आईपीसी की धारा 420 और 409

Fri, 19 Jun 2026 11:48 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 19 Jun 2026 11:48 AM IST
सार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 और 406 एक साथ नहीं लगायी जा सकती। किसी केस में यह दोनों धाराएं एक साथ लगायी गयी हैं तो वह केस कानून की नजर में टिक नहीं सकता।

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Significant ruling by the Allahabad High Court, IPC Sections 420 and 409 cannot be invoked simultaneously
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 और 406 एक साथ नहीं लगायी जा सकती। किसी केस में यह दोनों धाराएं एक साथ लगायी गयी हैं तो वह केस कानून की नजर में टिक नहीं सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने सुनाया है।  कोर्ट ने मेरठ जिले के सिविल लाइंस थाने में दर्ज (राज्य बनाम अभिषेक गौतम) केस को संज्ञान लिए जाने और उस पर जारी समन को रद्द कर दिया है।

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 याचिकाकर्ता अभिषेक गौतम के खिलाफ धारा 420, 406, 504, 506 आईपीसी में थाना सिविल लाइन्स, जिला मेरठ में प्राथमिकी दर्ज है। अपर मुख्य न्यायाधीश कोर्ट ने याची के खिलाफ संज्ञान/समन आदेश जारी किया था। याची ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल संज्ञान/समन आदेश सहित पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम और अधिवक्ता अतिप्रिया गौतम ने दलील दी कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में जो भी तथ्य दिए गये हैं वह गलत तथ्यों पर आधारित है। केस में दिए गए तथ्य मनमाने और मनगढ़ंत हैं, जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। राज्य की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के दलीलों का विरोध किया।

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कोर्ट ने लैंडमार्क फैसले का किया जिक्र

कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिल्ली रेस क्लब केस में सुनाए गए लैंडमार्क फैसले का जिक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक विश्वासघात और धोखाधड़ी के बीच फर्क है। धोखाधड़ी के लिए गलत या गुमराह करने वाली बात कहते समय यानी शुरुआत से ही आपराधिक नीयत का होना जरूरी है। आपराधिक विश्वासघात में सिर्फ यह साबित करना काफी है कि कोई चीज भरोसे में सौंपी गई थी। इस तरह आपराधिक विश्वासघात के मामले में अपराधी को कानूनी तौर पर संपत्ति सौंपी जाती है और वह बेईमानी से उसका गलत इस्तेमाल करता है। जबकि धोखाधड़ी के मामले में  अपराधी किसी व्यक्ति को धोखा देकर या बहकाकर कोई संपत्ति देने के लिए उकसाता है। ऐसी स्थिति में दोनों अपराध एक साथ नहीं हो सकते। कोर्ट ने याची के खिलाफ संज्ञान लिए जाने और उस पर जारी समन को रद्द कर दिया है।

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