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UP: डीएलएड अभ्यर्थियों को बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने कहा- फिसड्डी शिक्षकों के हवाले नहीं कर सकते बच्चों का भविष्य

Sat, 21 Feb 2026 01:43 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 21 Feb 2026 01:43 AM IST
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Prayagraj: High Court says children's future cannot be left to incompetent teachers
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (डीएलएड) के उन अभ्यर्थियों को बड़ा झटका दिया है, जो एक ही विषय में तीन बार फेल होने के बाद चौथे अवसर (अतिरिक्त मौके) की मांग कर रहे थे। कोर्ट ने कहा कि मासूम बच्चों का भविष्य फिसड्डी शिक्षकों के हवाले नहीं किया जा सकता।

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कोर्ट ने कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना राज्य का सांविधानिक दायित्व है। यदि बार-बार फेल होने वाले अभ्यर्थियों को नियमों के विरुद्ध जाकर शिक्षक बनने का मौका दिया गया तो यह उन मासूम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा, जिन्हें ये पढ़ाएंगे।
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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने राज्य सरकार की स्पेशल अपील को स्वीकार कर लिया। साथ ही एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें तीन बार फेल हो चुके छात्रों को अतिरिक्त मौका देने का निर्देश दिया गया था।
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गौरतलब है कि डीएलएड कोर्स के नियमों के मुताबिक, यदि कोई प्रशिक्षु किसी एक विषय में तीन बार अनुत्तीर्ण होता है तो उसका प्रशिक्षण समाप्त मान लिया जाता है। हालांकि, सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी ने 2021 और 2022 में कुछ छात्रों के प्रत्यावेदन पर उन्हें विशेष अवसर देते हुए परीक्षा में बैठने की अनुमति दी थी।

इसके बाद ऐसे सैकड़ों छात्रों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। समानता के आधार पर उन्होंने भी अतिरिक्त अवसर की मांग की थी। उनकी इस मांग को एकल पीठ ने स्वीकार करते हुए परीक्षा में अतिरिक्त अवसर देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने खंडपीठ के समक्ष स्पेशल अपील दाखिल की थी।

सरकार की दलील
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रशिक्षुओं को पहले ही पर्याप्त अवसर दिए जा चुके थे। शिक्षा नियामक प्राधिकारी के सचिव के पास नियमों को शिथिल करने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है। किसी भी सरकारी आदेश के जरिये उन वैधानिक नियमों को नहीं बदला जा सकता जो केंद्र और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने निर्धारित किए हैं। नियम विरुद्ध दिए गए पिछले मौकों को आधार बनाकर नए अधिकारों की मांग करना वैधानिक रूप से गलत है।

समानता के आधार पर अवैध लाभ की मांग उचित नहीं
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि अधिकारियों ने पूर्व में कुछ छात्रों को नियमों के विरुद्ध जाकर अवैध लाभ दे दिया था तो अन्य छात्र भी उसी अवैध लाभ की मांग नहीं कर सकते। समानता का अधिकार केवल कानूनी और वैध कार्यों के लिए होता है, अवैध कार्यों को दोहराने के लिए नहीं।


एनसीटीई के नियम सर्वोपरि
कोर्ट ने कहा कि एनसीटीई के नियम राज्य के किसी भी कार्यकारी आदेश से ऊपर हैं। इसके मुताबिक दो साल का यह कोर्स अधिकतम तीन साल में पूरा होना अनिवार्य है। सचिव के पास इस समय सीमा को बढ़ाने या अतिरिक्त मौका देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

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