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विवि के बहाने मोदी का विरोध बना पब्लिसिटी स्टंट
अमर उजाला ब्यूरो।
Updated Thu, 10 Mar 2016 02:41 AM IST
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नरेंद्र माेदी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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विवादों की आड़ में उच्च शिक्षण संस्थान सियासी अखाड़ा बन गए हैं। परिसर की हर घटना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़कर तूल दिया जा रहा है। कई सियासतदारों के लिए यह विरोध खुद को स्थापित करने का माध्यम भी बन गया है। हैदराबाद के रोहित बेमुला और जेएनयू के कन्हैया कुमार के बाद नेताओं की नजर अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर है। छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह के प्रवेश को लेकर शुरू विवाद न सिर्फ राजनीतिक घमासान का मुद्दा बना है बल्कि इसे लेेकर विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भी दो खेमों में बंट गए हैं और अराजकता के बीच परिसर का माहौल तनावपूर्ण हो गया है। परिसर में शिक्षकों की राजनीति भी एक बार फिर हावी है। परीक्षा के समय ऐसे विवाद तथा परिसर में धरना-प्रदर्शन ने विद्यार्थियों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है।
ऋचा सिंह का आरोप है कि एबीवीपी के दबाव में कुलपति उनका उत्पीड़न कर रहे हैं। हैदराबाद और जेएनयू विवाद पर गरमाई राजनीति के बीच ऋचा की इस शिकायत को राजनीतिक दलों ने और हवा दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले आठ दलों के नेताओं ने इस मुद्दे पर एकता दिखाई। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के इशारे पर शिक्षण संस्थानों में विरोधी विचारधारा के लोगों का उत्पीड़न किया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्री एबीवीपी के सरंक्षक के रूप में काम कर रही हैं। वहीं ऋचा को मिल रहे प्रचार को भुनाने के लिए समाजवादी पार्टी भी पीछे नहीं रही। उसने महिला दिवस पर ऋचा को रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार देकर पूरे मुद्दे को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है।
इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हांगलू का कहना है कि ऋचा सिंह के प्रवेश का विवाद पुराना है। उस समय वह कुलपति भी नहीं थे। एक शिकायत पर उन्होंने डीन आर्ट्स से रिपोर्ट मांगी थी। उन्होंने प्रवेश में आरक्षण नियमों की अनदेखी की बात कही है। इसके बाद भी ऋचा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। हर पहलू पर जांच के लिए कमेटी बनाई गई है। ऋचा का उत्पीड़न का आरोप निराधार है। इस मामले को हैदराबाद और जेएनयू विवाद से जोड़कर देखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। डीन आर्ट्स प्रोफेसर ए.सत्यनारायण का कहना है कि ऋचा सिंह के प्रवेश में आरक्षण नियमों का उल्लंघन हुआ है लेकिन इस मामले को इतना तूल देना समझ से परे है। इस बारे में ऋचा से भी बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनका मोबाइल नहीं उठा।
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ऋचा सिंह का आरोप है कि एबीवीपी के दबाव में कुलपति उनका उत्पीड़न कर रहे हैं। हैदराबाद और जेएनयू विवाद पर गरमाई राजनीति के बीच ऋचा की इस शिकायत को राजनीतिक दलों ने और हवा दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले आठ दलों के नेताओं ने इस मुद्दे पर एकता दिखाई। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के इशारे पर शिक्षण संस्थानों में विरोधी विचारधारा के लोगों का उत्पीड़न किया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्री एबीवीपी के सरंक्षक के रूप में काम कर रही हैं। वहीं ऋचा को मिल रहे प्रचार को भुनाने के लिए समाजवादी पार्टी भी पीछे नहीं रही। उसने महिला दिवस पर ऋचा को रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार देकर पूरे मुद्दे को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है।
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इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हांगलू का कहना है कि ऋचा सिंह के प्रवेश का विवाद पुराना है। उस समय वह कुलपति भी नहीं थे। एक शिकायत पर उन्होंने डीन आर्ट्स से रिपोर्ट मांगी थी। उन्होंने प्रवेश में आरक्षण नियमों की अनदेखी की बात कही है। इसके बाद भी ऋचा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। हर पहलू पर जांच के लिए कमेटी बनाई गई है। ऋचा का उत्पीड़न का आरोप निराधार है। इस मामले को हैदराबाद और जेएनयू विवाद से जोड़कर देखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। डीन आर्ट्स प्रोफेसर ए.सत्यनारायण का कहना है कि ऋचा सिंह के प्रवेश में आरक्षण नियमों का उल्लंघन हुआ है लेकिन इस मामले को इतना तूल देना समझ से परे है। इस बारे में ऋचा से भी बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनका मोबाइल नहीं उठा।
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