हाईकोर्ट की टिप्पणी : सांसदों-विधायकों से अपराध में लिप्त होकर समाज को नुकसान पहुंचाने की अपेक्षा नहीं
न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जो लोग समाज के संरक्षक हैं और एमपी-एमएलए या एमएलसी आदि हैं। उन पर जनता के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है। उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपराध में लिप्त होकर समाज को नुकसान पहुंचाएगे।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व एमएलसी कमलेश पाठक को गैंगस्टर एक्ट के तहत औरैया में दर्ज मुकदमे में जमानत देने से इन्कार कर दिया है। कोर्ट ने पाठक के 37 मुकदमों वाले लंबे आपराधिक इतिहास को देखते हुए जमानत पाने का हकदार नहीं माना। हालांकि, न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह की अदालत ने ट्रायल कोर्ट को वरीयता के आधार पर मुकदमा निपटाने का निर्देश जरूर दिया।
कमलेश पाठक के खिलाफ औरैया थाने में 11 जुलाई 2020 को गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। उनके विरुद्ध हत्या और हत्या के प्रयास सहित अन्य गंभीर अपराधों की धाराओं में दर्ज दो मुकदमों को आधार बनाते हुए गैंगस्टर एक्ट का यह मुकदमा कायम किया गया था।
आरोप लगा कि गैंग लीडर कमलेश पाठक का काम रंगदारी, फिरौती, सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा, लोगों पर हमला करने व फायरिंग करके आर्थिक लाभ लेना है। दहशत कायम रखना है। उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें उसे कभी सजा नहीं हो पाई क्योंकि उसके भय के कारण कोई सामने नहीं आता। सरकार में पैठ का फायदा उठाकर उसने कई मुकदमों को समाप्त करा लिया है।
कमलेश पाठक के खिलाफ दर्ज हैं 37 मुकदमें
कमलेश पाठक ने औरैया के आर्य नगर स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर की जमीन के लिए अधिवक्ता मंजुल चौबे और उसकी बहन सुधा चौबे की हत्या कर दी थी, जिसकी वजह से समाज में उसका भय व दहशत और अधिक बढ़ गई थी। उनका पहला जमानत प्रार्थना पत्र हाईकोर्ट ने खारिज किया था, जिसके खिलाफ विशेष अपील भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। शीर्ष अदालत के निर्देश पर ही उसने दोबारा हाईकोर्ट में जमानत प्रार्थना पत्र दिया था।
कमलेश के वकीलों का कहना था कि वह 14 जुलाई 2020 से जेल में है। पूर्व एमएलसी है। उनके मुकदमे का ट्रायल अभी तक पूरा नहीं हुआ। 16 में से सिर्फ 6 गवाहों के बयान हुए हैं। याची सभी मामलों में जमानत पर है। उसके खिलाफ कुल 37 मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें से वह आठ में बरी हो चुका है। 13 मुकदमों में फाइनल रिपोर्ट लग चुकी है। सात मुकदमे राज्य सरकार वापस ले चुकी है। दो केस में कोई नोटिस या सम्मन नहीं मिला। दो मुकदमे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के हैं, जबकि चार में ट्रायल चल रहा है।
वहीं, मंजुल चौबे के परिवार की ओर से मौजूद अधिवक्ता और सरकारी वकील का कहना था कि याची के प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है कि 13 मुकदमों में उसने फाइनल रिपोर्ट लगवा ली है। इनमें हत्या, फिरौती, हत्या का प्रयास जैसे गंभीर मुकदमे भी शामिल हैं। यदि उसे जमानत पर रिहा किया गया तो वह गवाहों और साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। कोर्ट ने जमानत प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया।