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यूपी : हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी- धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब मनचाही सरकारी जमीन पाने का अधिकार नहीं

Wed, 14 Oct 2026 10:27 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 14 Oct 2026 10:27 AM IST
सार

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी समुदाय को अपनी पसंद की सरकारी जमीन आवंटित कराने का कानूनी हक नहीं देता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में कब्रिस्तान के लिए जमीन देने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उपयोग के लिए जमीन आरक्षित करने का फैसला स्थानीय जरूरतों, व्यापक जनहित और कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रशासन को करना है।

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High Court sharp remark – Freedom of religion does not mean the right to acquire government land
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धर्म की आजादी के नाम पर कब्रिस्तान के लिए स्थानीय निकाय की किसी खास जमीन की मांग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने गाजियाबाद में कब्रिस्तान के लिए जमीन आवंटित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।

यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी की याचिका पर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्राम सभा या स्थानीय निकाय की जमीन को कब्रिस्तान जैसे सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित करना प्रशासनिक निर्णय है। इस प्रक्रिया में क्षेत्र की जरूरतों और विभिन्न व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है। किसी व्यक्ति या समुदाय को अपनी पसंद की सरकारी जमीन को सार्वजनिक उपयोग के लिए परिवर्तित कराने का ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है, जिसे अदालत के माध्यम से लागू कराया जा सके।

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क्या है पूरा मामला

मामला गाजियाबाद की मोदीनगर तहसील के विसोखर गांव स्थित 0.3420 हेक्टेयर बंजर जमीन से जुड़ा है। याची सोसाइटी का कहना था कि आसपास रहने वाले ईसाई समुदाय के लोगों को अंतिम संस्कार करने में परेशानी हो रही है। सोसाइटी ने इस संबंध में प्रशासनिक अधिकारियों से जमीन आवंटित करने की मांग की थी।

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हालांकि, अपर जिलाधिकारी (प्रशासन), गाजियाबाद ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77(2) के तहत जनवरी में सोसाइटी के अनुरोध को खारिज कर दिया था। इसके बाद सोसाइटी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर प्रशासन के फैसले को चुनौती दी।

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प्रशासन ने जताई थी सांप्रदायिक मतभेद की आशंका

सुनवाई के दौरान सरकारी अधिकारियों ने दलील दी कि संबंधित जमीन राजस्व अभिलेखों में बंजर दर्ज है और परंपरागत रूप से इसका इस्तेमाल कब्रिस्तान के रूप में नहीं हुआ है। प्रशासन ने यह भी बताया कि क्षेत्र में पहले से ही एक ईसाई कब्रिस्तान मौजूद है। इसके अलावा, नई जमीन आवंटित करने से स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक मतभेद पैदा होने की आशंका भी जताई गई थी।

व्यापक जनहित पर विचार करना प्रशासन का काम

कोर्ट ने प्रशासन की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी खास सरकारी जमीन को अपनी पसंद से आवंटित कराने का आधार नहीं बन सकता। जमीन के उपयोग और आवंटन से जुड़े निर्णय में व्यापक जनहित, स्थानीय जरूरतों और कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों पर विचार करना प्रशासनिक अधिकारियों का काम है।याचिका में हस्तक्षेप का कोई कानूनी आधार नहीं पाते हुए हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

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