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हाईकोर्ट का आदेश : फांसी की सजा पाए नौकरों का नए सिरे से दर्ज हो बयान

Sun, 19 Nov 2023 02:28 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 19 Nov 2023 02:28 PM IST
सार

मामला हापुड़ के देहात क्षेत्र का है। वर्ष 2018 में एक डेयरी संचालक दोपहर में पशुओं के लिए चारा लेने गया था। उसकी पत्नी अपने बड़े बेटे के साथ मायके गई थी। घर पर उसकी 12 साल की बेटी, आठ साल का बेटा व नौकर अंकुर तेली मौजूद था।

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High Court order  Statements of servants sentenced to death should be recorded afresh.
अदालत। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हापुड़ की सत्र अदालत को मालिक की बेटी से सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में फांसी की सजा पाए दो नौकरों के बयान नए सिरे से दो महीने में दर्ज कराने का आदेश दिया है। आरोपियों को मृतका के मूक भाई की गवाही के आधार पर दोष सिद्ध करते हुए फांसी की सजा सुनाई गई थी। यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की खंडपीठ ने मुल्जिम सोनू उर्फ पौव्वा और अंकुर तेली की ओर से फांसी की सजा की पुष्टि के लिए निचली अदालत द्वारा संदर्भित प्रकरण की सुनवाई करते हुए दिया।

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मामला हापुड़ के देहात क्षेत्र का है। वर्ष 2018 में एक डेयरी संचालक दोपहर में पशुओं के लिए चारा लेने गया था। उसकी पत्नी अपने बड़े बेटे के साथ मायके गई थी। घर पर उसकी 12 साल की बेटी, आठ साल का बेटा व नौकर अंकुर तेली मौजूद था। इस दौरान डेयरी पर काम करने वाला एक और नौकर सोनू उर्फ पौव्वा वहां पहुंचा और बच्ची से गलत हरकत करने लगा।

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भाई ने विरोध किया तो नौकरों ने उसका गला रेत दिया और बच्ची को भूसे वाले कमरे में ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म किया और घर में लूटपाट कर भाग निकले थे। बच्ची का शव भूसे वाले कमरे में अर्धनग्न अवस्था में मिला था, जबकि गले की नस कट जाने के कारण मृतका के भाई की आवाज चली गई। मामले में पुलिस ने नौकर अंकुर और सोनू उर्फ पौव्वा को गिरफ्तार कर लिया।

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लगभग दो साल चले विचारण के दौरान घटना में मूक हुए मृतका के भाई की गवाही के आधार पर अपर जिला सत्र विशेष न्यायाधीश पॉक्सो बीना नारायण की अदालत ने दोनों नौकरों को फांसी की सजा सुनाई थी। जबकि, एक अन्य आरोपी को दोषमुक्त किया गया था। फांसी की सजा की पुष्टि के लिए निचली अदालत ने मामले को हाईकोर्ट संदर्भित किया था।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जिस मूक गवाह की गवाही के आधार पर फांसी की सजा सुनाई गई है, उसकी गवाही न तो स्पष्ट थी और न ही इसमें विधिक प्रक्रिया का पालन किया गया था। हाइकोर्ट के आदेश पर मूक गवाह की दोबारा गवाही कराई गई, लेकिन मुल्जिमों को बयान दर्ज कराने का अवसर दिए बिना निचली अदालत ने अभिलेखों को हाईकोर्ट भेज दिया।
 

हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा निचली अदालत को वापस करते हुए दो माह में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत मुल्जिमों के बयान दर्ज कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन गवाह के विरुद्ध 313 की कार्यवाही मुल्जिम का महत्वपूर्ण अधिकार है, जिससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता।

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