हाईकोर्ट : निष्पक्ष सुनवाई पीड़ित ही नहीं, आरोपी का भी मौलिक अधिकार, हत्या के मामले में दोबारा जिरह का आदेश
मामला जौनपुर के बक्सा थाना क्षेत्र का है। 2019 में हत्या के मामले में याची को आरोपी बनाया गया था। पुलिस की ओर से दाखिल आरोप पत्र पर जौनपुर की सत्र अदालत अदालत ने ट्रायल शुरू किया है। इस दौरान अभियोजन के गवाह नंबर आठ अरविंद कुमार यादव की गवाही पूरी हो चुकी थी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या से जुड़े ट्रायल में विवेचक से दोबारा जिरह की मांग मान ली। कहा कि निष्पक्ष सुनवाई न सिर्फ पीड़ित, बल्कि आरोपी का भी मौलिक अधिकार है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय कुमार पचौरी की अदालत ने जौनपुर के विनोद कुमार की याचिका पर अधिवक्ता तनिषा जहांगीर मुनीर की दलीलों को सुनकर दिया।
याची ने ट्रायल कोर्ट की ओर से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत आरोपी की अर्जी खारिज कर दी थी। आरोपी ने गवाही खत्म होने के बाद मामले के विवेचक अरविंद यादव से पुनः जिरह करने की इजाजत मांगी थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। वहीं, याचिका स्वीकार कर विवेचक अरविंद कुमार यादव से 15 दिन के भीतर फिर से जिरह पूरी करने की इजाजत दे दी।
मामला जौनपुर के बक्सा थाना क्षेत्र का है। 2019 में हत्या के मामले में याची को आरोपी बनाया गया था। पुलिस की ओर से दाखिल आरोप पत्र पर जौनपुर की सत्र अदालत अदालत ने ट्रायल शुरू किया है। इस दौरान अभियोजन के गवाह नंबर आठ अरविंद कुमार यादव की गवाही पूरी हो चुकी थी। हालांकि, विवेचना से जुड़े दस्तावेज में पाया गया कि गवाहों से पूछताछ के दौरान तैयार की गई रिपोर्ट में विवेचक ने कॉर्बन कॉपी का प्रयोग किया था। इसके अवलोकन से प्रथम दृष्टया प्रतीत हो रहा था कि जांच रिपोर्ट में धाराओं का विवरण और अपराध संख्या किसी अन्य ने लिखी थी।
याची अधिवक्ता की दलील
याची की अधिवक्ता तनीषा जहंगीर मुनीर ने दलील दी कि विवेचक की जांच रिपोर्ट में बयान की कॉर्बन प्रति केस डायरी का हिस्सा है। कॉर्बन कॉपी में जिन स्थानों पर धुंधलापन है, वहां किसी अन्य के हस्तलेख की पुष्टि हो रही है। वह हस्तलेख विवेचक के हैं या किसी और के, इसको जानने के लिए विवेचक की जिरह की जानी न्यायहित में जरूरी है। लेकिन, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की अर्जी को अवैधानिक रूप से तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, जो गलत है।
कानून की महिमा बनाए रखना अदालत का कर्तव्य
कोर्ट ने कहा कि न्याय प्रशासन में जनता का विश्वास और ‘कानून की महिमा’ को बनाए रखना अदालत का कर्तव्य है। आपराधिक कार्यवाहियों में होने वाले कष्टप्रद या दमनकारी आचरण पर अदालत आंखें नहीं मूंद सकती। मुकदमे का उद्देश्य सभी पक्षों को न्याय देना है। इसमें पीड़ित और आरोपी दोनों ही शामिल हैं। इसलिए मुकदमे में सच्चाई की खोज की प्रकिया को तकनीकी आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।