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हाईकोर्ट का अहम फैसला : किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला सरकारी नौकरी में बाधा नहीं बन सकता, बर्खास्तगी रद्द
Thu, 20 Aug 2026 07:29 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 20 Aug 2026 07:29 PM IST
सार
Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मुकदमे को सरकारी नौकरी में बाधक मानने से इनकार करते हुए सीआरपीएफ के बर्खास्त आरक्षी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने बर्खास्तगी, अपील और पुनरीक्षण के आदेश रद्द करते हुए 25 फीसदी बकाया वेतन देने का निर्देश दिया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला किशोर के वयस्क होने पर सरकारी नौकरी में बाधक नहीं बन सकता। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मुकदमे की जानकारी न देने के आधार पर बर्खास्त किए गए सीआरपीएफ के आरक्षी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उसकी बर्खास्तगी समेत अपील और पुनरीक्षण के आदेशों को रद्द करते हुए 25 फीसदी बकाया वेतन देने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने चंद्रेश्वर प्रसाद यादव की याचिका पर दिया है।
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याची वर्ष 2003 में सीआरपीएफ में आरक्षी पद पर भर्ती हुआ था। प्रशिक्षण के दौरान चरित्र सत्यापन में पता चला कि उसके खिलाफ आजमगढ़ में वर्ष 2001 में गाली-गलौज, मारपीट और धमकी देने के आरोप में मुकदमा दर्ज था। जानकारी छिपाने के आधार पर पांच अगस्त 2004 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता श्याम शरन श्रीवास्तव ने दलील दी कि मुकदमा दर्ज होने के समय याची नाबालिग था। किशोर न्याय अधिनियम के तहत किशोरावस्था में दर्ज मामले का वयस्क होने के बाद सरकारी सेवा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
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एकलपीठ ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि याची को 28 फरवरी 2005 को मामले में बरी कर दिया गया था। इसके बाद भी पुनरीक्षण प्राधिकारी ने इस तथ्य पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने करीब 20 वर्ष तक सेवा से बाहर रहने के कारण याची को केवल 25 फीसदी बकाया वेतन देने का आदेश दिया गया।
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