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हाईकोर्ट : आपराधिक मामले में बरी होने से खत्म नहीं होता विभागीय दंड, पुलिसकर्मी के खिलाफ विभागीय दंड बहाल
Wed, 21 Oct 2026 05:34 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 21 Oct 2026 05:34 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में संदेह का लाभ देकर बरी होने मात्र से कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई खत्म नहीं हो जाती। विभागीय जांच में आरोप साबित करने का मानक आपराधिक मुकदमे से अलग है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में संदेह का लाभ देकर बरी होने मात्र से कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई खत्म नहीं हो जाती। विभागीय जांच में आरोप साबित करने का मानक आपराधिक मुकदमे से अलग है।
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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही अलीगढ़ निवासी पुलिसकर्मी जितेंद्र कुमार के खिलाफ विभागीय दंडादेश और अपीलीय आदेश निरस्त करने संबंधी राज्य सेवा न्यायाधिकरण का फैसला रद्द कर दिया। विभागीय दंड को बहाल कर दिया। पुलिसकर्मी पर ड्यूटी के दौरान शराब के नशे में रहने और एक महिला के घर में अवैध रूप से घुसने समेत अन्य आरोप लगे थे।
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आपराधिक मुकदमे में महिला के बयान से आरोपी की पहचान की पुष्टि नहीं हो सकी। इसका लाभ देते हुए अदालत ने उसे बरी कर दिया था। बाद में न्यायाधिकरण ने कर्मचारी को बचाव का पर्याप्त अवसर नहीं मिलने के आधार पर विभागीय दंडादेश निरस्त कर दिया। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि विभागीय जांच में गवाहों ने आरोपी के महिला के घर पहुंचने और स्थानीय लोगों की मदद से पकड़े जाने की बात कही थी।
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होम्योपैथिक दवा का लिया था सहारा
कर्मचारी ने दावा किया था कि घटना के समय वह परीक्षा केंद्र पर सुरक्षा ड्यूटी कर रहा था। उसने यह भी कहा था कि होम्योपैथिक दवा के सेवन से उसके शरीर में अल्कोहल पहुंचा था। हालांकि, अदालत के समक्ष चिकित्सीय जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कर्मचारी के घटनास्थल पर मौजूद न होने के दावे को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में दोष सिद्ध करने के लिए आरोप संदेह से परे साबित करना जरूरी है, जबकि विभागीय जांच में संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है।