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नौ लोगों के खून से सनी 38 साल की रंजिश की कहानी, जिसमें 24 साल बाद मिली रिहाई
Thu, 21 Jan 2021 03:05 PM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
Published by: अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 21 Jan 2021 03:05 PM IST
सार
- 9 लोगों की जान ले चुकी है गांव में मामूली झगड़े से शुरू हुई यह रंजिश
- 3 लोगों की एक साथ पुलिस अभिरक्षा में दीवानी में हत्या से आया था भूचाल
- 28 साल पहले आखिरी घटना के बाद दोनों पक्षों में सुलह, अब साथ रहते हैं
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
अलीगढ़-पलवल रोड पर बसा छोटी सी आबादी वाला गांव ल्हौसरा पहचान का मोहताज नहीं। आज ये गांव ट्रांसपोर्ट नगर और राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर सुर्खियों में है। तीन दशक पहले तक यह गांव जिले की टॉप 3 रंजिश वाले गांवों में शामिल होने के कारण पुलिस प्रशासनिक मशीनरी के निशाने पर तो रहता ही था। समाचार पत्रों में भी सुर्खियों में रहता था। एक दशक तक चली इस रंजिश में कुल 9 जानें गईं। कचहरी में दिनदहाड़े पुलिस अभिरक्षा में तीन लोगों की हत्या ने तो जिले में भूचाल ही ला दिया।
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1983 में शुरू हुई थी रंजिश
हर जुबां पर गांव ल्हौसरा, उसकी रंजिश और उससे जुड़े किरदारों का जिक्र रहता था। मगर, कुछ समय बाद सुलह की नीव पड़ी और अब सब कुछ सामान्य हो गया। इसी रंजिश के अहम किरदार ठा. मुनेशपाल सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने 24 साल बाद जेल में उनके चाल-चलन, गांव में रंजिश के खात्मे, उनकी बुजुर्गी का ध्यान रखते हुए जमानत दी है। मंगलवार देर शाम जिला कारागार से उनकी रिहाई हो गई। कुल मिलाकर 1983 में शुरू हुई इस रंजिश से मुनेशपाल 38 साल बाद यानि जवानी से बुढ़ापे में रिहा हुए हैं।
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गांव में ऐसे पड़ी रंजिश की नींव
शहर से करीब 10 किमी दूरी पर बसे इस गांव के कुबेर सिंह पक्ष का गांव में ही झगड़ा हुआ था। इस झगड़े में गांव के सरकारी सेवा (गर्वमेंट प्रेस) में तैनात महेंद्र सिंह के बेटे बलवीर सिंह ने कुबेर सिंह के खिलाफ वाले पक्ष का सहयोग किया। चूंकि, महेंद्र सिंह पक्ष का रसूख था। इसलिए कुबेर सिंह पक्ष ने बलवीर सिंह की हत्या के इरादे से उन पर हमला किया और उन्हें तीन गोलियां लगीं। मगर, वे बच गए। इसके बाद इस रंजिश की नींव पड़ी और पिता महेंद्र सिंह की ड्यूटी से लौटते समय हत्या कर दी गई। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका।
दोनों पक्षों ने जमकर बहाया खून
महेंद्र सिंह की हत्या में गवाह उनकी खेती में नौकरी करने वाले भूदेव व उनकी पत्नी की भी घर में हत्या की गई। फिर पलटवार शुरू हुआ और दोहरे हत्याकांड में जेल गए कुबेर पक्ष के नेपाल सिंह, योगेंद्र व धन्नो की उस समय हत्या की गई, जब वे जेल से पुलिस अभिरक्षा में तारीख पर आए थे, तीनों दीवानी न्यायालय की नई बिल्डिंग यानि सीजेएम कोर्ट के ऊपर वाले हिस्से में पुलिस अभिरक्षा में बैठे थे। इसी पक्ष के प्रमोद की गांव में हत्या हुई। फिर बलवीर सिंह की हत्या हुई और आखिर में दूसरे पक्ष के कुबेर सिंह को भी मौत के घाट उतारा गया। तब जाकर दोनों पक्ष शांत हुए।
हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय का पलटा सजा-ए-मौत का फैसला
तिहरे हत्याकांड में आरोपी जुगेंद्र (पूर्व में मारे गए नौकर दंपती का बेटा) को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, जबकि मुनेशपाल सिंह, रनवीर सिंह, बलवीर सिंह, गवेंद्र सिंह, हाकिम सिंह व बच्चू सिंह नामजद किए गए। इस हत्याकांड में एडीजे प्रथम पीके अग्रवाल के न्यायालय ने जुगेंद्र को फांसी की सजा सुनाई गई, जबकि साक्ष्यों के अभाव में बाकी आरोपियों को बरी कर दिया गया। फांसी के फैसले के खिलाफ जुगेंद्र पक्ष हाईकोर्ट गया, जबकि बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अभियोजन पक्ष भी हाईकोर्ट गया। इन दोनों अपीलों की हाईकोर्ट में संयुक्त सुनवाई हुई, जिसमें 1997 में हाईकोर्ट ने यह तय पाया कि घटना के समय जुगेंद्र नाबालिग था। इसलिए उसे बरी कर दिया गया, जबकि बाकी आरोपियों को उम्रकैद से दंडित किया गया।
सिर्फ दो सजायाफ्ता जीवित हैं इस तिहरे हत्याकांड में
तिहरे हत्याकांड में सिर्फ दो सजायाफ्ता यानि मुनेश पाल सिंह व उनके परिवार के रनवीर सिंह जीवित हैं। बाकी की मृत्यु हो चुकी है। मुनेशपाल सिंह 1997 में हाईकोर्ट से सजा सुनाए जाने के बाद से अलीगढ़ जिला कारागार में मंगलवार शाम छह बजे तक निरुद्ध थे, जबकि रनवीर सिंह अभी जेल में हैं। समझौता होने के बाद से लगातार मुनेशपाल सिंह पक्ष उनकी रिहाई के लिए प्रयासरत था।
शासन ने किया खारिज, सुप्रीम कोर्ट से राहत
मुनेश पाल पक्ष के अधिवक्ता नीरज चौहान व नीरज शर्मा के अनुसार वर्ष 2017 में जिला स्तरीय रिहाई समिति (डीएम, एसएसपी, प्रोवेशन अधिकारी व कारागार अधीक्षक) ने एलआईयू रिपोर्ट के आधार पर शासन को उनकी रिहाई की संस्तुति दी। जिसमें उल्लेख था कि उनका चाल-चलन जेल में ठीक है। 65 वर्ष उम्र पार कर जाने के कारण बुजुर्गी में अब ये अपराध करने में अक्षम हैं और गांव में रंजिश में सुलह के बाद सब कुछ सामान्य है और दोनों पक्ष साथ रहते हैं, मगर शासन ने इस रिहाई संस्तुति को खारिज कर दिया। इसके बाद यह पक्ष सुप्रीम कोर्ट गया, जिसमें जिला स्तरीय रिहाई समिति की संस्तुति को आधार बनाकर अपील की गई। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह पहले जमानत मंजूर कर ली। सुप्रीम कोर्ट का जमानत आदेश स्थानीय न्यायालय में प्राप्त होने के बाद जमानत की औपचारिकताएं पूरी की गईं और मंगलवार शाम 6 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया।
जेल से आकर किया ट्रांसपोर्ट नगर को पहला बैनामा
तिहरे हत्याकांड में सजायाफ्ता मुनेश पाल सिंह के छोटे भाई व मौजूदा ग्राम प्रधान ठा. रहीशपाल सिंह के अनुसार उनके गांव के पास उनकी कृषि भूमि पर ट्रांसपोर्ट नगर बन रहा है। जिसमें उनकी जमीन भी आ रही थी। उसके लिए सबसे पहला बैनामा खुद मुनेशपाल सिंह ने ही किया था। इसके लिए न्यायालय की अनुमति पर जून 2019 में दो तारीखों पर वे पुलिस अभिरक्षा में तहसील कोल पहुंचे थे। बड़े भाई की रिहाई पर परिवार में खुशी का माहौल है। अब रंजिश को खत्म हुए दो दशक से अधिक समय बीत गया। अब दोनों परिवार साथ रहते हैं। चुनाव में दूसरे पक्ष ने मुझे जिताने में पूरी ताकत लगाई थी। आगे भी हम इसी तरह रहेंगे।
जिला स्तरीय समिति की संस्तुति शासन से खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसे स्वीकार करते हुए मुनेशपाल सिंह को जमानत पर रिहा किया गया है। बाकी अभी निस्तारण होना बाकी है। उम्मीद है कि जल्द ही अपील का निस्तारण हो जाएगा। वहीं दूसरे सजायाफ्ता रनवीर सिंह की रिहाई बाकी है। उसके लिए हमारे प्रयास जारी हैं। - नीरज चौहान एडवोकेट
ये इस रंजिश का बहीखाता
- 12 फरवरी 1983 को गांव के बलवीर सिंह को मामूली झगड़े में तीन गोली मारी, बचे
- 30 अप्रैल 1983 बलवीर के पिता महेंद्र सिंह की गर्वमेंट प्रेस से लौटते समय हत्या
- 1984 में महेंद्र सिंह की हत्या के गवाह उनके नौकर भूदेव दंपती की गांव में हत्या
- 8 मई 1984 को दूसरे पक्ष के नेपाल, योगेंद्र, धन्नो की कस्टडी में कचहरी में हत्या
- 1991 में फिर मौका मिलने पर बलवीर पक्ष ने दूसरे पक्ष के ही प्रमोद की हत्या की
- 1993 में पहले पक्ष के मुखिया बलवीर सिंह की ग्राम प्रधान रहते गांव में ही हत्या
- 1993 में ही बलवीर सिंह की हत्या के बदले दूसरे पक्ष के मुखिया कुबेर की हत्या
- 1995 में जिला पुलिस व प्रशासन के दखल पर दोनों पक्षों में कराई गई थी सुलह