पा के तुझको खुद को बंदा कर लिया मैंने
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खुदा की शान और इबादत को सूफी अंदाज में जब पिरोया जाता है तो कव्वाली जन्म लेती है। मंगलवार की रात नुमाइश के कोहिनूर मंच पर निजामी बंधु और कव्वाल बेबी डिस्को के बीच सिर्फ मुकाबला भर नहीं था। बल्कि एक हजार साल पुरानी वह परंपरा जीवंत हो रही थी जिसकी बुनियाद हजरत अमीर खुसरो के वक्त में पड़ी थी। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से उनकी शान में कलाम पढ़ने वालों के वंशज निजामी बंधु कोहिनूर मंच पर उसी परंपरा को जिंदा कर रहे थे।
माहौल में थोड़ा जमाने का मिजाज घोलने के लिए बेबी डिस्को भी मौजूद थीं। यहां यह भी जान लेना जरूरी होगा कि हजरत अमीर खुसरो के वक्त ही फारसी, अरबी, तुर्की के भाषाई मिश्रण के साथ जब संगीत का मिलन हुआ और हिंदवी जुबां साथ आई तो वह कव्वाली कहलाई। करीब 13 वीं शताब्दी में कव्वाली आज के मुताबिक शक्ल अखित्यार कर चुकी थी।
निजामी बंधुओं ने खुदा की शान में अलीगढ़ के ही दानिश अलीगढ़ी का नातिया कलाम ‘पा के तुझको खुद को बंदा कर लिया मैंने, ये महंगा हो या सस्ता सौदा कर लिया मैंने’। इसे सुनने वालों की जमकर दाद मिली। कलाम के बीच में ही निजामी बंधुओं ने बुले शाह के फलसफे को भी पिरोया। इसके बाद निजामी बंधुओं ने हजरत अमीर खुसरो का वह कलाम पेश किया तो कायनात तक जिंदा रहेगा। छाप तिलक सब छीनी री तौसे नेहा मिलाई के, जब प्रस्तुत किया तो सुनने वाले सांसें रोकने को मजबूर हो गए।
यह बात अलग है कि पंडाल में जो लोग थे वह सुनने वाले थे, देखने वाले नहीं। इसके बाद सुफियाना सफर को आगे ले जाने की जिम्मेदारी बेबी डिस्को ने उठाई। उन्होंने सधे हुए अंदाज में ‘मेरे अल्लाह मुुकम्मल मेरा ईमां कर दे’ पेश किया तो सुनने वाले खुद को खुदा के करीब महसूस करने लगे। बेबी ने ‘पहाड़ वालों से राई भी छीन सकता है’ और रगों में दौड़ने फिरने का सकू देता है’ जैसे अशआर जब पेश किए तो समां बांध दिया। इससे पहले कार्यक्रम का उद्घाटन एडीएम सिटी अवधेश तिवारी, सिटी मजिस्ट्रेट हिमांशु मित्तल, कार्यकारिणी सदस्य विष्णु कुमार बंटी, मुबीन खां, सपा छात्र नेता मुंतजिम किदवई, विशाल नरायण बंटी आदि मौजूद थे।