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आत्मनिर्भर भारत का असहयोग झेल रही खादी
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हरदुआगंज आश्रम में कमरे में बंद अंबर चरखे ।
- फोटो : CITY OFFICE
आशीष निगम
श्रीगांधी आश्रम की स्थापना के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके 47 क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रमों के अंतर्गत खादी और सूती कपड़ा बनाने की पूरी मशीनरी हाथ पर हाथ रख कर बैठी है। लॉकडाउन के बाद से इनकी हालात और खराब हो गई है। ये हाल तब है जब केंद्र की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद करा रही है। सरकारों के निर्देश पर प्रशासनिक अधिकारी भी हर दिन नई ऊर्जा दे रहे हैं। लेकिन हालात इससे ठीक उलट हैं।
हकीकत यह है कि गांव-गांव कपास उगाने वाले, रुई बनाने वाले, सूत कातने वाले, कपड़ा बनाने वाले बुनकर इन दिनों हजारों की तादाद बेरोजगार हो चुके हैं, क्योंकि इनके पास काम नहीं है। इन कपड़ों से शहरों में चमकने वाले क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम और हरदुआगंज उत्पत्ति केंद्र के भंडार एवं बिक्री केंद्र भी धुंधले हो रहे हैं, जिनकी संख्या दो दर्जन के करीब है। यहां सैकड़ों के स्टाफ में से केवल चंद लोग ही बचे हैं। उनको भी यहां पर्याप्त काम और मेहनताना नहीं नसीब हो रहा है। जिससे शहरी युवाओं का रोजगार भी छूट रहा है। वो दूसरे कामों की ओर जाने को मजबूर हैं। यकीन मानिए... आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद कराने वाले नेता जिन सूती कुर्तों में चमकते हैं, अगर उसी सूती और खादी को ईमानदारी से संभाल लेते तो कुछ हजार बेरोजगारों की संख्या कुछ तो कम होती...।
पहले थे हजारों हाथ और अब..
मेडू के केंद्र से जुड़े अंबर चरखा के एक्सपर्ट वीरेंद्र सिंह ने बताया कि वर्तमान में यहां के आश्रम से 40 बुनकर, 150 अंबर चरखे वाली कातिन, 600 के करीब साधारण चरखे की कातिन काम कर रही हैं। इनमें से कई के पास महीनों से काम नहीं है। इससे पहले 1990 के दशक तक इनकी संख्या हजारों में थी। जिसमें एक हजार के करीब बुनकर ही थे। इसके अलावा तीन से चार हजार कातिन थी। जिसकी वजह से खादी और सूती कपड़ा हजारों मीटर में बनता था और इसकी हाथोंहाथ बिक्री होती थी। इनमें से अधिकांश संख्या महिलाओं की है जो घर के कामकाज के साथ कातिन और बुनकर भी होती हैं।
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अंबर चरखा : बीस हजार रुपये में आना वाला ये चरखा एक साथ आठ पूनी बनाने में सक्षम होता है।
किसान चरखा : 300 रुपये में आना वाला ये चरखा केवल एक पूनी पर ही काम करता है।
नर्मदा चरखा : 600 रुपये तक आने वाले इस चरखे में एक पूनी पर ही सूत काता जा सकता है।
बारीक सूत : 30 से 35 नंबर तक का सूत महीन और बेहद बारीक कपड़ा बुनने में काम आता है। नेताओं के महंगे कुर्ते अक्सर इसी नंबर के सूत से बने कपड़े से बनते हैं। जो महंगे होने के साथ ही बेहद आकर्षक होते हैं।
मोटा सूत : 7 से 12 नंबर वाले सूत से बने कपड़े से मोटी खादी, दरी, खेज, रजाई-गद्दे-ताकिये के खोल, चादर, रजाई और गद्दे के कवर आदि बनाए जाते हैं।
आखिर खादी क्यों हैं महंगी..?
सूत मोटा हो या महीन। इसका कपड़ा बनाने में उतना ही खर्च होता है जितने का सूत होता है। मसलन अगर 100 रुपये का सूत है तो इसका कपड़ा तैयार करने में भी इतना ही पैसा लगेगा। क्योंकि सूत, कपड़ा, धुलाई, रंगाई, छपाई के बाद पूरा थान जब स्टोर पहुंचता है, तो इतना खर्च हो जाता है। सभी प्रक्रिया अलग अलग स्थानों पर होने से खर्च अधिक होता है। इसीलिए बाजार में खादी दूसरे कपड़ों से पिछड़ रही है। अगर सूत से कपड़ा तक सारी प्रक्रिया एक स्थान पर हो, तो ये काफी सस्ता हो सकता है। इससे उत्पादन बढ़ भी सकता है। लेकिन सरकारी नियंत्रण के कारण ऐसा होना मुश्किल है।
72 से 22 पर पहुंचा स्टाफ
श्रीगांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र हरदुआगंज के जामवंत मौर्य ने बताया कि रामघाट रोड पर 150 बीघे में बने इस आश्रम का शिलान्यास उस वक्त के मंत्री भालचंद्र पांडेय ने 27 जनवरी 1983 को किया था। उस वक्त यहां के व्यवस्थापक भरत प्रसाद थे। अलीगढ़ स्थित क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम से हरदुआगंज का कामकाज उसी दिन से अलग हो गया। इसके बाद हरदुआगंज आश्रम अपने स्तर पर सूत कातने, कपड़ा बनवाने का काम करने लगा। शुरुआती दौर में यहां पर लगभग 72 लोगों का स्टाफ था। अब इसकी संख्या 22 तक सिमट गई है।
10 हजार मीटर से एक हजार तक गिरा उत्पादन
इस आश्रम के अंतर्गत आने वाले बुनकर और कातिन मिल कर हर दो महीने में दस हजार मीटर खादी और सूती वस्त्र बनाते थे। अब ये एक हजार मीटर तक रह गया है। लॉकडाउन से लेकर अभी तक केवल इतना ही कपड़ा आया है। जिसे केंद्रों पर बेचने को भेजा गया है।
खत्म होते रहे केंद्र, बचीं केवल दुकानें
उत्पत्ति केंद्र हरदुआगंज के महेश प्रसाद ने बताया कि यहां के अधीन एक दर्जन केंद्र एवं भंडार गृह हैं। जिसमें हरदुआगंज आश्रम के गेट के बाहर एक केंद्र व एक भंडार गृह है। इसके अलावा समद रोड, चुहरपुर, अतरौली, कौडिय़ागंज, जवां, छर्रा, मेड़ू, जटटारी में एक केंद्र हैं। दो केंद्र सिकंदराराऊ में हैं। लगभग चार से पांच वर्ष पहले तक इन सभी केंद्रों पर कपड़ा बनवाने का काम होता है भंडारण होता था अब ये केवल बिक्री केंद्र रह गए हैं।
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श्रीगांधी आश्रम की स्थापना के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके 47 क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रमों के अंतर्गत खादी और सूती कपड़ा बनाने की पूरी मशीनरी हाथ पर हाथ रख कर बैठी है। लॉकडाउन के बाद से इनकी हालात और खराब हो गई है। ये हाल तब है जब केंद्र की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद करा रही है। सरकारों के निर्देश पर प्रशासनिक अधिकारी भी हर दिन नई ऊर्जा दे रहे हैं। लेकिन हालात इससे ठीक उलट हैं।
हकीकत यह है कि गांव-गांव कपास उगाने वाले, रुई बनाने वाले, सूत कातने वाले, कपड़ा बनाने वाले बुनकर इन दिनों हजारों की तादाद बेरोजगार हो चुके हैं, क्योंकि इनके पास काम नहीं है। इन कपड़ों से शहरों में चमकने वाले क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम और हरदुआगंज उत्पत्ति केंद्र के भंडार एवं बिक्री केंद्र भी धुंधले हो रहे हैं, जिनकी संख्या दो दर्जन के करीब है। यहां सैकड़ों के स्टाफ में से केवल चंद लोग ही बचे हैं। उनको भी यहां पर्याप्त काम और मेहनताना नहीं नसीब हो रहा है। जिससे शहरी युवाओं का रोजगार भी छूट रहा है। वो दूसरे कामों की ओर जाने को मजबूर हैं। यकीन मानिए... आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद कराने वाले नेता जिन सूती कुर्तों में चमकते हैं, अगर उसी सूती और खादी को ईमानदारी से संभाल लेते तो कुछ हजार बेरोजगारों की संख्या कुछ तो कम होती...।
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पहले थे हजारों हाथ और अब..
मेडू के केंद्र से जुड़े अंबर चरखा के एक्सपर्ट वीरेंद्र सिंह ने बताया कि वर्तमान में यहां के आश्रम से 40 बुनकर, 150 अंबर चरखे वाली कातिन, 600 के करीब साधारण चरखे की कातिन काम कर रही हैं। इनमें से कई के पास महीनों से काम नहीं है। इससे पहले 1990 के दशक तक इनकी संख्या हजारों में थी। जिसमें एक हजार के करीब बुनकर ही थे। इसके अलावा तीन से चार हजार कातिन थी। जिसकी वजह से खादी और सूती कपड़ा हजारों मीटर में बनता था और इसकी हाथोंहाथ बिक्री होती थी। इनमें से अधिकांश संख्या महिलाओं की है जो घर के कामकाज के साथ कातिन और बुनकर भी होती हैं।
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अंबर चरखा : बीस हजार रुपये में आना वाला ये चरखा एक साथ आठ पूनी बनाने में सक्षम होता है।
किसान चरखा : 300 रुपये में आना वाला ये चरखा केवल एक पूनी पर ही काम करता है।
नर्मदा चरखा : 600 रुपये तक आने वाले इस चरखे में एक पूनी पर ही सूत काता जा सकता है।
बारीक सूत : 30 से 35 नंबर तक का सूत महीन और बेहद बारीक कपड़ा बुनने में काम आता है। नेताओं के महंगे कुर्ते अक्सर इसी नंबर के सूत से बने कपड़े से बनते हैं। जो महंगे होने के साथ ही बेहद आकर्षक होते हैं।
मोटा सूत : 7 से 12 नंबर वाले सूत से बने कपड़े से मोटी खादी, दरी, खेज, रजाई-गद्दे-ताकिये के खोल, चादर, रजाई और गद्दे के कवर आदि बनाए जाते हैं।
आखिर खादी क्यों हैं महंगी..?
सूत मोटा हो या महीन। इसका कपड़ा बनाने में उतना ही खर्च होता है जितने का सूत होता है। मसलन अगर 100 रुपये का सूत है तो इसका कपड़ा तैयार करने में भी इतना ही पैसा लगेगा। क्योंकि सूत, कपड़ा, धुलाई, रंगाई, छपाई के बाद पूरा थान जब स्टोर पहुंचता है, तो इतना खर्च हो जाता है। सभी प्रक्रिया अलग अलग स्थानों पर होने से खर्च अधिक होता है। इसीलिए बाजार में खादी दूसरे कपड़ों से पिछड़ रही है। अगर सूत से कपड़ा तक सारी प्रक्रिया एक स्थान पर हो, तो ये काफी सस्ता हो सकता है। इससे उत्पादन बढ़ भी सकता है। लेकिन सरकारी नियंत्रण के कारण ऐसा होना मुश्किल है।
72 से 22 पर पहुंचा स्टाफ
श्रीगांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र हरदुआगंज के जामवंत मौर्य ने बताया कि रामघाट रोड पर 150 बीघे में बने इस आश्रम का शिलान्यास उस वक्त के मंत्री भालचंद्र पांडेय ने 27 जनवरी 1983 को किया था। उस वक्त यहां के व्यवस्थापक भरत प्रसाद थे। अलीगढ़ स्थित क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम से हरदुआगंज का कामकाज उसी दिन से अलग हो गया। इसके बाद हरदुआगंज आश्रम अपने स्तर पर सूत कातने, कपड़ा बनवाने का काम करने लगा। शुरुआती दौर में यहां पर लगभग 72 लोगों का स्टाफ था। अब इसकी संख्या 22 तक सिमट गई है।
10 हजार मीटर से एक हजार तक गिरा उत्पादन
इस आश्रम के अंतर्गत आने वाले बुनकर और कातिन मिल कर हर दो महीने में दस हजार मीटर खादी और सूती वस्त्र बनाते थे। अब ये एक हजार मीटर तक रह गया है। लॉकडाउन से लेकर अभी तक केवल इतना ही कपड़ा आया है। जिसे केंद्रों पर बेचने को भेजा गया है।
खत्म होते रहे केंद्र, बचीं केवल दुकानें
उत्पत्ति केंद्र हरदुआगंज के महेश प्रसाद ने बताया कि यहां के अधीन एक दर्जन केंद्र एवं भंडार गृह हैं। जिसमें हरदुआगंज आश्रम के गेट के बाहर एक केंद्र व एक भंडार गृह है। इसके अलावा समद रोड, चुहरपुर, अतरौली, कौडिय़ागंज, जवां, छर्रा, मेड़ू, जटटारी में एक केंद्र हैं। दो केंद्र सिकंदराराऊ में हैं। लगभग चार से पांच वर्ष पहले तक इन सभी केंद्रों पर कपड़ा बनवाने का काम होता है भंडारण होता था अब ये केवल बिक्री केंद्र रह गए हैं।