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बाइडन की जीत में भारतीय रशाद का भी अहम योगदान
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रशाद हुसैन अलीगढ़ में एएमयू में अपने मामा प्रो. हुमायू मुराद, मामी डॉ. नौशाबा मुराद के साथ।
- फोटो : CITY OFFICE
दीपक शर्मा
अमेरिका में राष्ट्रपति चुने गए बाइडन के अभियान के पीछे पूर्व राष्ट्रपति और डेमोक्रेटिक पार्टी के अहम सदस्य बराक ओबामा और उनकी टीम के साथियों का भी योगदान है। ओबामा की टीम के ही खास सदस्य रशाद हुसैन के रिश्तेदार अलीगढ़ में एएमयू के प्रोफेसर हुमायूं मुराद रहते हैं। अमेरिका में हुए सत्ता परिवर्तन और उसमें बराक ओबामा और रशाद हुसैन की भूमिका को लेकर प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि भारत के दृष्टिकोण से यह सत्ता परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण है। आईटी पेशेवरों के लिए यह बदलाव बहुत ही राहत देने वाला है।
रशाद हुसैन पिछली बार 5 वर्ष पहले अलीगढ़ में निजी यात्रा पर अपने मामा प्रोफेसर हुमायूं मुराद के यहां आए थे। प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि वह मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले हैं। रशाद हुसैन की मां रुकैया हुसैन ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमबीबीएस किया था। इसके बाद वह अमेरिका में प्रैक्टिस करने चली गई थीं। रशाद हुसैन का जन्म भी वहीं पर हुआ। रशाद हुसैन अमेरिका में डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस में अधिकारी हैं। बराक ओबामा के राष्ट्रपति काल में वह उनके विशेष दूत के रूप में काम कर रहे थे। मौजूदा चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बराक ओबामा के साथ-साथ उनकी पूरी टीम काम कर रही थी। इसमें रशाद हुसैन भी शामिल थे।
एएमयू में जंतु विज्ञान विभाग में रहे प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि जो बाइडन के चुनाव जीतने के बाद एक उदारता का माहौल आएगा। ट्रंप बहुत चरमपंथ की बात करते थे। उसमें बहुत गिरावट आएगी। इसके अलावा भारत के लिए गर्व की बात यह भी है कि वहां पर उपराष्ट्रपति भी भारतीय मूल की एक महिला चुनी गई हैं। सीनेट के 4 सदस्य वहां पर भारतीय मूल के हैं। प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रशाद हुसैन की उनसे लगातार फोन पर चुनाव के संबंध में बातचीत होती रहती थी और वह अमेरिका में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रमों के विषय में बताते रहते थे। चुनाव में मिली जीत के संबंध में भी रशाद ने अपने मामा को बताया था, जिसके बाद प्रोफेसर हुमायूं मुराद ने उन्हें बधाई दी थी।
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विशेष दूत के रूप में 8 साल पहले एएमयू आए थे रशाद हुसैन
करीब 8 साल पहले सन 2012 में जब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पीके अब्दुल अजीज कुलपति थे, तब रशाद हुसैन राष्ट्रपति बराक ओबामा के विशेष दूत बनकर भारत में आए थे। अपनी यात्रा के क्रम में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम के लिए स्थानीय प्रशासन ने भारी-भरकम प्रोटोकॉल का पालन किया था। उस समय रशाद हुसैन अपने मामा और मामी से मिलने मेडिकल कॉलेज रोड भी गए थे, लेकिन प्रोटोकॉल के चलते अन्य स्थानीय लोगों से मुलाकात नहीं हो पाई थी।
बाइडन के समर्थकों में एएमयू के फ्रैंक इस्लाम भी हैं
डेमोक्रेटिक पार्टी को समर्थन करने वालों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ अमेरिका में एक और नाम बहुत महत्वपूर्ण है। वह है वहां के उद्योगपति फ्रैंक इस्लाम का। मूल रूप से आजमगढ़ के रहने वाले फ्रैंक इस्लाम ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की। प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि वह पढ़ाई में बहुत होशियार थे। उनका मूल नाम फखरुल इस्लाम था। उस समय एएमयू में अमेरिका के आईटी विशेषज्ञों का एक दल आया था।
उन्होंने जब देखा के फ्रैंक इस्लाम बहुत काबिल व्यक्ति हैं तो उन्हें अमेरिका आने का न्योता दिया। इसके बाद इस्लाम ने अमेरिका में अपनी सफलता की शुरुआत की। फ्रैंक इस्लाम और उनकी पत्नी डेवी इस्लाम के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक ऑडिटोरियम और एक बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन सेंटर भी है।
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अमेरिका में राष्ट्रपति चुने गए बाइडन के अभियान के पीछे पूर्व राष्ट्रपति और डेमोक्रेटिक पार्टी के अहम सदस्य बराक ओबामा और उनकी टीम के साथियों का भी योगदान है। ओबामा की टीम के ही खास सदस्य रशाद हुसैन के रिश्तेदार अलीगढ़ में एएमयू के प्रोफेसर हुमायूं मुराद रहते हैं। अमेरिका में हुए सत्ता परिवर्तन और उसमें बराक ओबामा और रशाद हुसैन की भूमिका को लेकर प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि भारत के दृष्टिकोण से यह सत्ता परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण है। आईटी पेशेवरों के लिए यह बदलाव बहुत ही राहत देने वाला है।
रशाद हुसैन पिछली बार 5 वर्ष पहले अलीगढ़ में निजी यात्रा पर अपने मामा प्रोफेसर हुमायूं मुराद के यहां आए थे। प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि वह मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले हैं। रशाद हुसैन की मां रुकैया हुसैन ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमबीबीएस किया था। इसके बाद वह अमेरिका में प्रैक्टिस करने चली गई थीं। रशाद हुसैन का जन्म भी वहीं पर हुआ। रशाद हुसैन अमेरिका में डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस में अधिकारी हैं। बराक ओबामा के राष्ट्रपति काल में वह उनके विशेष दूत के रूप में काम कर रहे थे। मौजूदा चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बराक ओबामा के साथ-साथ उनकी पूरी टीम काम कर रही थी। इसमें रशाद हुसैन भी शामिल थे।
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एएमयू में जंतु विज्ञान विभाग में रहे प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि जो बाइडन के चुनाव जीतने के बाद एक उदारता का माहौल आएगा। ट्रंप बहुत चरमपंथ की बात करते थे। उसमें बहुत गिरावट आएगी। इसके अलावा भारत के लिए गर्व की बात यह भी है कि वहां पर उपराष्ट्रपति भी भारतीय मूल की एक महिला चुनी गई हैं। सीनेट के 4 सदस्य वहां पर भारतीय मूल के हैं। प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रशाद हुसैन की उनसे लगातार फोन पर चुनाव के संबंध में बातचीत होती रहती थी और वह अमेरिका में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रमों के विषय में बताते रहते थे। चुनाव में मिली जीत के संबंध में भी रशाद ने अपने मामा को बताया था, जिसके बाद प्रोफेसर हुमायूं मुराद ने उन्हें बधाई दी थी।
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विशेष दूत के रूप में 8 साल पहले एएमयू आए थे रशाद हुसैन
करीब 8 साल पहले सन 2012 में जब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पीके अब्दुल अजीज कुलपति थे, तब रशाद हुसैन राष्ट्रपति बराक ओबामा के विशेष दूत बनकर भारत में आए थे। अपनी यात्रा के क्रम में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम के लिए स्थानीय प्रशासन ने भारी-भरकम प्रोटोकॉल का पालन किया था। उस समय रशाद हुसैन अपने मामा और मामी से मिलने मेडिकल कॉलेज रोड भी गए थे, लेकिन प्रोटोकॉल के चलते अन्य स्थानीय लोगों से मुलाकात नहीं हो पाई थी।
बाइडन के समर्थकों में एएमयू के फ्रैंक इस्लाम भी हैं
डेमोक्रेटिक पार्टी को समर्थन करने वालों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ अमेरिका में एक और नाम बहुत महत्वपूर्ण है। वह है वहां के उद्योगपति फ्रैंक इस्लाम का। मूल रूप से आजमगढ़ के रहने वाले फ्रैंक इस्लाम ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की। प्रोफेसर हुमायूं मुराद कहते हैं कि वह पढ़ाई में बहुत होशियार थे। उनका मूल नाम फखरुल इस्लाम था। उस समय एएमयू में अमेरिका के आईटी विशेषज्ञों का एक दल आया था।
उन्होंने जब देखा के फ्रैंक इस्लाम बहुत काबिल व्यक्ति हैं तो उन्हें अमेरिका आने का न्योता दिया। इसके बाद इस्लाम ने अमेरिका में अपनी सफलता की शुरुआत की। फ्रैंक इस्लाम और उनकी पत्नी डेवी इस्लाम के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक ऑडिटोरियम और एक बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन सेंटर भी है।