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अलीगढ़ : विदेशों में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं सुरेंद्र सुकुमार

Wed, 25 Aug 2021 01:12 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 25 Aug 2021 01:12 AM IST
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Aligarh: Surendra Sukumar is busy in popularizing Hindi abroad
सुरेंद्र सुकुमार कवि - फोटो : CITY OFFICE
दुनिया के आधा दर्जन देशों में जाकर अपने व्यंग और कविता के माध्यम से हिंदी को लोकप्रिय बनाने का कार्य कर चुके प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कवि सुरेंद्र सुकुमार इन दिनों अपनी आत्मकथा लिखने में जुटे हुए हैं। ओजोन सिटी में रह रहे सुरेंद्र सुकुमार तीन बार अमेरिका, दो बार दुबई, तीन बार मस्कट, एक बार जॉर्डन, एक बार चीन और दो बार इंग्लैंड में जाकर कवि सम्मेलन में शिरकत कर चुके हैं।
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सुरेंद्र सुकुमार कहते हैं विदेशों में हिंदी के चाहने वाले बहुत शिद्दत से कविता को पसंद करते हैं। हिंदी में कविता को सुनकर उन्हें लगता है कि वह अपने वतन के और नजदीक आ गए हैं। वतन से दूर अपनी भाषा के लिए उनका अनुराग और भी बढ़ जाता है।
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1953 में अलीगढ़ के कौड़िया गंज में पैदा हुए सुरेंद्र सुकुमार ने आगरा विश्वविद्यालय की कासगंज स्थित कॉलेज से एमए एलएलबी किया। उन्होंने हिंदी में एमए किया और वह उस वर्ष विश्वविद्यालय के टॉपर रहे थे। सुरेंद्र सुकुमार की प्रमुख रचनाओं में अब चलो फिर आज गंगा में नहाएं, मैं हूं अब गमगीन, मुझे अब मत छेड़ो जी, खूब बजाए बीन अब घोड़ा राजा का जी, प्रधान जी के बेटे, हम शब्दों के व्यापारी हैं शब्द बेचने आए हैं आदि शामिल हैं।
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धारदार व्यंग्य लिखा, हमला हुआ, आरोपियों को क्षमा कर दिया
सुरेंद्र सुकुमार पर एक बार कुछ लोगों ने हमला किया और उन्हें गोली मार दी। जिसमें वह घायल हो गए। इस हमले के संबंध में वह कहते हैं कि उनकी एक प्रसिद्ध कविता है जिसका शीर्षक है रैट कमीशन। इस कविता में सूरत में चूहों के कारण हुई प्लेग की समस्या के बाद का चित्रण है।
इसमें चूहों को पकड़ने के लिए एक आयोग का गठन किया जाता है। इस आयोग के बहाने सरकार और प्रशासन में बैठे लोग भ्रष्टाचार करते हैं। चूहों को ग्रामीण भाषा में मूसे भी कहते हैं। यह बात एक समुदाय के लोगों को अखर गई और उन्होंने इसको मुद्दा बनाते हुए मुझे जान से मारने का प्रयास किया। लेकिन मैंने उनको क्षमा कर दिया।

बड़े सरकारी पुरस्कार न मिलने का मलाल नहीं
पुरस्कार के संबंध में सुरेंद्र सुकुमार कहते हैं कि उन्हें छोटे-मोटे पुरस्कार तो बहुत मिले लेकिन किसी बड़े पुरस्कार न मिलने का उन्हें कोई अफसोस नहीं है। हालांकि एक बार सपा नेता शिवपाल यादव ने यश भारती देने के लिए आवेदन देने के लिए कहा था। लेकिन मुझे किसी भी पुरस्कार के लिए आवेदन करना स्वीकार न था। देश-विदेश में श्रोताओं का जो स्नेह मुझको मिला है, वही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।
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