डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय 95वां स्थापना दिवस: एसएन मेडिकल कॉलेज भी है संबंद्ध, जानिए इतिहास
विश्वविद्यालय की स्थापना एक जुलाई 1927 को हुई। शुरूआत में 14 कॉलेज इससे संबद्ध थे फिर संख्या बढ़ती गई।
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डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (पूर्ववर्ती आगरा विश्वविद्यालय) एक जुलाई 2021 को 95 वर्ष का हो जाएगा। इस विश्वविद्यालय ने लोगों को उच्च शिक्षा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में 1100 से अधिक कॉलेज इस विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं। यहां तक की एसएन मेडिकल कॉलेज भी डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय से ही संबद्ध है।
विश्वविद्यालय की स्थापना एक जुलाई 1927 को हुई। शुरूआत में 14 कॉलेज इससे संबद्ध थे फिर संख्या बढ़ती गई।
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी प्रो. प्रदीप श्रीधर ने बताया कि 14 दिसंबर वर्ष 1953 को विश्वविद्यालय के पहले आवासीय संस्थान कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी एवं भाषा विज्ञान विद्यापीठ (केएमआई) की स्थापना हुई। यह संस्थान तत्कालीन राज्यपाल कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की प्रेरणा से स्थापित हुआ था। संस्थान के वर्तमान भवन का शिलान्यास पूर्व मुख्यमंत्री व तत्कालीन गृहमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत ने किया था।
जुलाई 1955 से संस्थान में अध्यापन कार्य शुरू हुआ। 17 जनवरी 1961 को विद्यापीठ के सत्रांत समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद शामिल हुए थे। सबसे बाद में सिविल लाइंस परिसर स्थित ललित कला संस्कृति भवन बना है। बस हैंडओवर होना है। भवन का शिलान्यास वर्ष 2017 में तत्कालीन राज्यपाल रामनाईक ने किया था। यह 40 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बना है।
पूर्व छात्र यहीं महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र इसी विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण पदों पर वर्तमान में काबिज हैं। यहां तक की कुलपति प्रो. अशोक मित्तल भी पूर्व छात्र रहे हैं। विभिन्न संस्थानों के डीन, विभागाध्यक्ष इसी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे है। इनका संकल्प है कि विश्वविद्यालय को अलग पहचान दिलानी है।
पीएचडी में नियमित प्रवेश सुनिश्चित करना लक्ष्य: प्रो. अजय
विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री विभागाध्यक्ष, डीन रिसर्च, निदेशक आईक्यूएसी और निदेशक कॉलेज डेवलपमेंट काउंसिल प्रो. अजय तनेजा ने बताया कि उन्होंने सेंट जोंस कॉलेज से बीएससी, एमएससी, पीएचडी की है। वर्ष 1993 से 2008 तक सेंट जोंस कॉलेज में इसके बाद से विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य कर रहे हैं। अब पीएचडी में नियमित प्रवेश सुनिश्चित कराना लक्ष्य है। वर्ष 2021 की प्रवेश परीक्षा कराने की तैयारी की जा रही है।
आईईटी को एनबीए से मान्यता दिलानी है: प्रो. वीके
इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (आईईटी) के निदेशक प्रो. वीके सारस्वत ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1999 से आईईटी में पढ़ाना शुरू किया। वर्ष 2004 में इसी विवि से पीएचडी की। कंप्यूटर साइंस में पीएचडी करने वाले वह पहले शोधार्थी रहे। वह वर्ष 2013 में संस्थान के निदेशक बने। टेक्विप के तहत 10 करोड़ रुपये की ग्रांट संस्थान के लिए प्राप्त की। उत्कृष्ट प्रदर्शन पर मानव संसाधन मंत्रालय ने एक करोड़ रुपये दिए। अब संस्थान को नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रीडिटेशन (एनबीए) से मान्यता दिलाना है।
विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. रामवीर सिंह ने बताया कि उन्होंने आगरा कॉलेज से वर्ष 1984 में बीएससी और 1986 में एमएससी की। इसके बाद विवि से एमफिल और पीएचडी की। वर्तमान आरबीएस कॉलेज में भौतिक विज्ञान विभागाध्यक्ष हैं। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के एनएसएस के स्वयंसेवक लगातार तीन वर्षों से एनएसएस का सर्वोच्च पुरस्कार राष्ट्रपति के हाथों प्राप्त कर रहे हैं। अब एनएसएस को नियमित विषय के रूप में मान्यता दिलाने के लिए प्रयास किया जाएगा।
शैक्षणिक स्तर को बेहतर बनाना है: प्रो. अशोक
कुलपति प्रो. अशोक मित्तल का कहना है कि अपने कार्यकाल में उन्होंने लंबित प्रकरणों के निस्तारण के लिए काफी काम किया है। लाखों लंबित अंकतालिकाएं कॉलेजों के माध्यम छात्रों को उपलब्ध कराई गई हैं। कोरोना काल में ई-लाइब्रेरी में शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने में विश्वविद्यालय प्रदेश में अव्वल रहा। केंद्रीय पुस्तकालय में ऑनलाइन सुविधाएं बढ़ाई गई हैं। बीएड के वर्ष 2004-05 के टेंपर्ड प्रमाणपत्रों के मामले में निर्णय लिया गया। आगे शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाने पर काम किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करना है। कुलपति का कहना है कि वह खुद इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं, इससे उनको बेहद लगाव है।
विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र होने पर गौरवान्वित हूं
भीमनगरी आयोजन समिति के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता करतार सिंह भारतीय ने बताया कि उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से 1967 में एमए और 1969 में एलएलबी की। उस समय सत्र नियमित रहता था। प्रति वर्ष दीक्षांत समारोह होता था। बिना प्रार्थनापत्र दिए प्रमाणपत्र मिल जाते थे। आगरा विश्वविद्यालय को देश-विदेश में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनका कहना है वह विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र होने पर गौरवान्वित हूं।
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