{"_id":"63650739c9a341304134b929","slug":"the-shine-of-kakoda-fair-has-faded-from-the-shadow-of-modernity-agra-news-agr552296525","type":"story","status":"publish","title_hn":"आधुनिकता की छाया से ककोड़ा मेला की चमक हो गई फीकी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आधुनिकता की छाया से ककोड़ा मेला की चमक हो गई फीकी
विज्ञापन
कासगंज का ककोड़ा मेला का फाइल फोटो।
- फोटो : KASGANJ
गंजडुंडवारा। रुहेलखंड क्षेत्र का मिनी कुंभ कहे जाने वाले ककोड़ा मेले की चमक साल दर साल फीकी पड़ती जा रही है। यातायात के बढ़ते साधन, ऑनलाइन से लेकर जगह-जगह खुले बाजार, मेले में मनोरंजन के साधनों की कमी के कारण लोगों का मेले के प्रति रुझान घटता जा रहा है। इसका दूसरा प्रमुख कारण लोगों में ग्रामीणांचल के प्रति कम होता लगाव भी है।
एक समय था जब लोग घोड़ा गाड़ी और बैलगाड़ी पर सवार होकर मेला देखने आते थे, और मेले से जरूरत के साथ गृहस्थी का सामान खरीदकर ले जाते थे। इस दौरान लोग मां गंगा के आंचल की छाया में कल्पवास भी करते थे। इससे मेले के तकरीबन 30 किलोमीटर के आसपास का एरिया गुलजार रहता था। मेले से हर वर्ग के ग्रामीणों की आय में इजाफा होता था। मेले में बिकने वाली वस्तुएं तब बाजारों में सहज उपलब्ध नहीं हुआ करती थी। दूर-दराज के हस्तशिल्पियों द्वारा बनाई चीजें उन्हें खूब लुभाती। मिट्टी के बर्तन हो या पत्थरों की चाकी और सिलबट्टे, वे इनकी खूब खरीदारी करते। तब सूकून भरी जिंदगी में न वक्त की कमी थी और न शहरों के प्रति आकर्षण।
वक्त बदला तो बैलगाड़ी का स्थान मोटरगाड़ी ने ले लिया। इससे लोग सुबह मेला देखने आते और शाम को वापस घर लौट जाते हैं। ऑनलाइन और आफ लाइन बाजारों में जरूरत के सामान उपलब्ध होने लगें हैं। ऐसे में लोगों को लगने वाले मेले में खरीदने के लिए कोई नया सामान नहीं होता। इसके अलावा आधुनिकता की दौड़ में अब शहर लोगों की पहली पसंद बन गए हैं। दूसरी तरफ अब मेले में मनोरंजन के साधन भी काफी कम हो गए हैं। बदांयू जनपद में लगने वाला ककोड़ा मेला इस बात का प्रमाण है, दो सप्ताह तक लगने वाले इस ककोड़ा मेले में लोगों की आवक कम रहती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
एक समय था जब लोग घोड़ा गाड़ी और बैलगाड़ी पर सवार होकर मेला देखने आते थे, और मेले से जरूरत के साथ गृहस्थी का सामान खरीदकर ले जाते थे। इस दौरान लोग मां गंगा के आंचल की छाया में कल्पवास भी करते थे। इससे मेले के तकरीबन 30 किलोमीटर के आसपास का एरिया गुलजार रहता था। मेले से हर वर्ग के ग्रामीणों की आय में इजाफा होता था। मेले में बिकने वाली वस्तुएं तब बाजारों में सहज उपलब्ध नहीं हुआ करती थी। दूर-दराज के हस्तशिल्पियों द्वारा बनाई चीजें उन्हें खूब लुभाती। मिट्टी के बर्तन हो या पत्थरों की चाकी और सिलबट्टे, वे इनकी खूब खरीदारी करते। तब सूकून भरी जिंदगी में न वक्त की कमी थी और न शहरों के प्रति आकर्षण।
विज्ञापन
वक्त बदला तो बैलगाड़ी का स्थान मोटरगाड़ी ने ले लिया। इससे लोग सुबह मेला देखने आते और शाम को वापस घर लौट जाते हैं। ऑनलाइन और आफ लाइन बाजारों में जरूरत के सामान उपलब्ध होने लगें हैं। ऐसे में लोगों को लगने वाले मेले में खरीदने के लिए कोई नया सामान नहीं होता। इसके अलावा आधुनिकता की दौड़ में अब शहर लोगों की पहली पसंद बन गए हैं। दूसरी तरफ अब मेले में मनोरंजन के साधन भी काफी कम हो गए हैं। बदांयू जनपद में लगने वाला ककोड़ा मेला इस बात का प्रमाण है, दो सप्ताह तक लगने वाले इस ककोड़ा मेले में लोगों की आवक कम रहती है।
विज्ञापन