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Agra News: हुनर को मिला मंच...बदल गई शमीम बानो की जिंदगी
Thu, 20 Nov 2025 02:41 AM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Updated Thu, 20 Nov 2025 02:41 AM IST
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शमीम बानो से जरदोजी का काम सीखती छात्रा।
- फोटो : संवाद
आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान संस्थान स्थित महिला अध्ययन केंद्र में सात दिवसीय जरदोजी कढ़ाई कार्यशाला आयोजित की गई। अब छात्राओं की मांग पर इसे सात दिन के लिए बढ़ा दिया गया है।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शमीम बानो की छिपी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें मंच प्रदान किया गया। कुलपति प्रो. आशु रानी ने कहा कि शमीम बानो 2011 से विश्वविद्यालय में सेवारत हैं और वर्षों से पारंपरिक कढ़ाई की विशिष्ट कला जानती हैं। अवसर के अभाव में यह हुनर सीमित दायरे में रह गया था। उनकी कला को देखकर उन्हें प्रशिक्षक के रूप में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
शमीम ने चौपेल, मोती, गिजाई, सितारा और डोरा जैसी तकनीकों से पारंपरिक जरदोजी का अभ्यास छात्राओं को कराया। डिजाइन बनाने से लेकर फ्रेम सेट करने तक की बारीकियों को सिखाया। उन्होंने कहा कि उन्हें अब विश्वविद्यालय के बाहर भी पहचान मिल रही है। कार्यशाला में छात्राओं की सक्रिय सहभागिता और बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी अवधि सात दिन और बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। अब कार्यशाला में गांवों और बस्तियों की महिलाओं को भी शामिल किया जाएगा, ताकि वे इस कला को सीखकर स्वरोजगार से जुड़ सकें।
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कार्यशाला में विश्वविद्यालय की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शमीम बानो की छिपी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें मंच प्रदान किया गया। कुलपति प्रो. आशु रानी ने कहा कि शमीम बानो 2011 से विश्वविद्यालय में सेवारत हैं और वर्षों से पारंपरिक कढ़ाई की विशिष्ट कला जानती हैं। अवसर के अभाव में यह हुनर सीमित दायरे में रह गया था। उनकी कला को देखकर उन्हें प्रशिक्षक के रूप में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
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शमीम ने चौपेल, मोती, गिजाई, सितारा और डोरा जैसी तकनीकों से पारंपरिक जरदोजी का अभ्यास छात्राओं को कराया। डिजाइन बनाने से लेकर फ्रेम सेट करने तक की बारीकियों को सिखाया। उन्होंने कहा कि उन्हें अब विश्वविद्यालय के बाहर भी पहचान मिल रही है। कार्यशाला में छात्राओं की सक्रिय सहभागिता और बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी अवधि सात दिन और बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। अब कार्यशाला में गांवों और बस्तियों की महिलाओं को भी शामिल किया जाएगा, ताकि वे इस कला को सीखकर स्वरोजगार से जुड़ सकें।
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