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सावधान: आलू में शुरू हुआ झुलसा रोग, बढ़ी किसानों की परेशानी
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मैनपुरी। जिले में आलू की फसल में झुलसा रोग लगना शुरू हो गया है। इससे आलू की फसल को बढ़ा नुकसान हो सकता है। मौसम में आद्रता अधिक होने के चलते दो दिन पूर्व ही कृषि अनुसंधान परिषद ने भी अलर्ट जारी किया था, लेकिन अनदेखी के चलते इसे रोका नहीं जा सका।
झुलसा की शुरुआत से जिले में आलू की खेती से जुड़े लगभग 1.10 लाख किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बीते वर्ष की अपेक्षा इस बार आलू का क्षेत्रफल 20 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 22 हजार हेक्टेयर हो गया है। दूसरी ओर आलू महंगा होने से पिछेती बुवाई भी जमकर हुई है। सर्दी शुरू होने के बाद से ही किसानों को आलू में झुलसा रोग लगने की चिंता सता रही थी। इसके लिए दिसंबर के अंतिम सप्ताह में चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय कानपुर की ओर से अलर्ट जारी किया गया था।
जनवरी के दूसरे पखवाड़े के पहले दिन ही कृषि अनुसंधान परिषद मेरठ ने जिले में पिछेती झुलसा रोग की आशंका जताई थी। इसके बाद भी आलू की फसल को बचाया नहीं जा सका। मैनपुरी विकास खंड में आलू के खेतों में पिछेती झुलसा रोग का असर दिखना शुरू हो गया है। आलू की बेल जलने के साथ ही खराब हो रही है। ये ऐसा रोग है जो तीन से चार दिन में ही आलू की बेल को पूरी तरह खत्म कर देता है। इससे आलू का विकास रुक जाता है और उत्पादन प्रभावित होता है। जिले के अन्य क्षेत्रों में झुलसा लगने की बात सामने आ रही है। इससे आलू का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
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ऐसे फसल को बचाएं झुलसा रोग से
कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ. विकास रंजन चौधरी ने बताया कि कुछ उपाय करके झुलसा रोग से आलू की फसल को बचाया जा सकता है। उनके अनुसार खेतों में नमी बनाए रखने से झुलसा रोग का प्रभाव कम होता है। इसके साथ ही मैंकोजेब या प्रोपिनेब के अलावा क्लोरोथेलोनिल युक्त फफूंदीनाशक दवाओं का दो से ढाई किलोग्राम प्रति एक हजार लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
झुलसा लगने पर इन दवाओं का करें छिड़काव
आलू की फसल में अगर झुलसा लग गया है तो इसे नियंत्रित करने के लिए अलग दवाएं हैं। उद्यान वैज्ञानिक डॉ. विकास रंजन चौधरी ने बताया कि इसके लिए साइमोक्सेनिल और मैंकोजेब या फेनोमेडोन और मैंकोजब या डाईमैथोमाफ और मैंकोजेब दवा की तीन किलो मात्रा का प्रति हजार लीटर घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
ऐसे पहचानें झुलसा या उसके लक्षण
झुलसा रोग हवा में आद्रता बढ़ने के कारण होता है। इसमें आलू की फसल की पत्ती पहले सिकुड़ना शुरू होती है। कई बार ये पत्तियां जलने जैसी प्रतीत होती हैं। प्रकोप बढ़ने पर पूरी बेल सूख जाती है, जिससे आलू की बढ़वार रुक जाती है।
फैक्ट फाइल
-22 हजार हेक्टेयर है आलू का क्षेत्रफल
-20 हजार हेक्टेयर बीते वर्ष था आलू का क्षेत्रफल
-1.10 लाख के करीब किसान करते हैं आलू की खेती
आलू की फसल में इस बार अच्छा मुनाफा हुआ था। इसी उम्मीद में किसानों ने आलू की बुवाई की, लेकिन इस बार झुलसा रोग से फसल में नुकसान शुरू हो गया है।
दरबारी लाल, रमईहार।
झुलसा रोग आलू में हर साल होता है। इससे बचाव के लिए पहले से ही दवाओं का छिड़काव शुरू करना होता है। बिना दवा के फसल बचाना बहुत मुश्किल होता है।
पातीराम सिंह, नगला निरंजन।
आलू की फसल में झुलसा रोग लगने से 50 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित होता है। बेल खराब होने के बाद आलू की प्रगति रुक जाती है और वह छोटा रह जाता है।
रामरतन सिंह, नगला पजाबा।
आलू की फसल में चेचक और झुलसा दो ही रोग होते हैं। चेचक से जहां आलू खराब हो जाता है तो वहीं झुलसा बेल को जला देता है और आलू का उत्पादन गिर जाता है।
गिरीश चंद्र, महुआहार।
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झुलसा की शुरुआत से जिले में आलू की खेती से जुड़े लगभग 1.10 लाख किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बीते वर्ष की अपेक्षा इस बार आलू का क्षेत्रफल 20 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 22 हजार हेक्टेयर हो गया है। दूसरी ओर आलू महंगा होने से पिछेती बुवाई भी जमकर हुई है। सर्दी शुरू होने के बाद से ही किसानों को आलू में झुलसा रोग लगने की चिंता सता रही थी। इसके लिए दिसंबर के अंतिम सप्ताह में चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय कानपुर की ओर से अलर्ट जारी किया गया था।
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जनवरी के दूसरे पखवाड़े के पहले दिन ही कृषि अनुसंधान परिषद मेरठ ने जिले में पिछेती झुलसा रोग की आशंका जताई थी। इसके बाद भी आलू की फसल को बचाया नहीं जा सका। मैनपुरी विकास खंड में आलू के खेतों में पिछेती झुलसा रोग का असर दिखना शुरू हो गया है। आलू की बेल जलने के साथ ही खराब हो रही है। ये ऐसा रोग है जो तीन से चार दिन में ही आलू की बेल को पूरी तरह खत्म कर देता है। इससे आलू का विकास रुक जाता है और उत्पादन प्रभावित होता है। जिले के अन्य क्षेत्रों में झुलसा लगने की बात सामने आ रही है। इससे आलू का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
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ऐसे फसल को बचाएं झुलसा रोग से
कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ. विकास रंजन चौधरी ने बताया कि कुछ उपाय करके झुलसा रोग से आलू की फसल को बचाया जा सकता है। उनके अनुसार खेतों में नमी बनाए रखने से झुलसा रोग का प्रभाव कम होता है। इसके साथ ही मैंकोजेब या प्रोपिनेब के अलावा क्लोरोथेलोनिल युक्त फफूंदीनाशक दवाओं का दो से ढाई किलोग्राम प्रति एक हजार लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
झुलसा लगने पर इन दवाओं का करें छिड़काव
आलू की फसल में अगर झुलसा लग गया है तो इसे नियंत्रित करने के लिए अलग दवाएं हैं। उद्यान वैज्ञानिक डॉ. विकास रंजन चौधरी ने बताया कि इसके लिए साइमोक्सेनिल और मैंकोजेब या फेनोमेडोन और मैंकोजब या डाईमैथोमाफ और मैंकोजेब दवा की तीन किलो मात्रा का प्रति हजार लीटर घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
ऐसे पहचानें झुलसा या उसके लक्षण
झुलसा रोग हवा में आद्रता बढ़ने के कारण होता है। इसमें आलू की फसल की पत्ती पहले सिकुड़ना शुरू होती है। कई बार ये पत्तियां जलने जैसी प्रतीत होती हैं। प्रकोप बढ़ने पर पूरी बेल सूख जाती है, जिससे आलू की बढ़वार रुक जाती है।
फैक्ट फाइल
-22 हजार हेक्टेयर है आलू का क्षेत्रफल
-20 हजार हेक्टेयर बीते वर्ष था आलू का क्षेत्रफल
-1.10 लाख के करीब किसान करते हैं आलू की खेती
आलू की फसल में इस बार अच्छा मुनाफा हुआ था। इसी उम्मीद में किसानों ने आलू की बुवाई की, लेकिन इस बार झुलसा रोग से फसल में नुकसान शुरू हो गया है।
दरबारी लाल, रमईहार।
झुलसा रोग आलू में हर साल होता है। इससे बचाव के लिए पहले से ही दवाओं का छिड़काव शुरू करना होता है। बिना दवा के फसल बचाना बहुत मुश्किल होता है।
पातीराम सिंह, नगला निरंजन।
आलू की फसल में झुलसा रोग लगने से 50 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित होता है। बेल खराब होने के बाद आलू की प्रगति रुक जाती है और वह छोटा रह जाता है।
रामरतन सिंह, नगला पजाबा।
आलू की फसल में चेचक और झुलसा दो ही रोग होते हैं। चेचक से जहां आलू खराब हो जाता है तो वहीं झुलसा बेल को जला देता है और आलू का उत्पादन गिर जाता है।
गिरीश चंद्र, महुआहार।