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प्रवासी साहित्य की परिभाषा समझना जरूरी: तेजेंद्र शर्मा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगारा Updated Sun, 14 Jan 2018 04:21 PM IST
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में उपस्थित अतिथि
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में उपस्थित अतिथि - फोटो : अमर उजाला
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‘प्रवासी भारतीय और प्रवासी साहित्य दो अलग-अलग चीजें हैं। उसमें घालमेल नहीं करना चाहिए। प्रवासी साहित्य की परिभाषा को समझना जरूरी है। आलोचकों को भी नई दीक्षा लेनी होगी, तभी वह प्रवासी साहित्य को समझ पाएंगे।’ ये बातें लंदन के वरिष्ठ साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा ने प्रवासी हिंदी साहित्य की दशा एवं दिशा पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में कही। 
आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी और भाषा विज्ञान विद्यापीठ की ओर से जेपी सभागार में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पहले सत्र में तेजेंद्र शर्मा मुख्य अतिथि रहे। 

उन्होंने बताया कि प्रवासी लेखन के तीन स्तर हैं। एक जो भारत छोड़कर गए हैं और देश की याद में लिख रहे हैं। दूसरे वह हैं जो अपने अपनाएं देश को समझने के दौर में जो भी सूचनाएं मिल रही हैं, उसे बताने की कोशिश कर रहे हैं। 

आखिरी स्तर के लेखन में वह लोग गए हैं, जो अपनाए गए देश को अपना समझकर लिख रहे हैं। जमशेदपुर की डॉ. मुदिता चंद्रा ने दो प्रवासी कहानियां सुनाईं। 
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