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डूब क्षेत्र से नहीं उबरा रियल एस्टेट कारोबार
अमर उजाला आगरा
Updated Fri, 06 May 2016 02:12 AM IST
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रियल एस्टेट रेग्युलरटी अथॉरिटी बिल को राज्य सभा में पास
- फोटो : Reuters
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यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए डूब क्षेत्र का निर्धारण भले ही न हो सका हो लेकिन इसकी वजह से रियल एस्टेट कारोबार जरूर डूब गया है। निर्माण के साथ-साथ मकान-फ्लैटों की खरीद-फरोख्त पर लगी रोक से बिल्डर करोड़ों रुपये के कर्जे में हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सख्त रुख को देखते हुए फिलहाल राहत की कोई उम्मीद नहीं है।
दम तोड़ती यमुना को उसके मूलस्वरूप में लाने के लिए पर्यावरणविद् डीके जोशी ने एनजीटी में पिछले साल चार मई को जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने यमुना किनारे हुए निर्माणों और गंदगी को नदी के लिए खतरा बताया था। इसके लिए नगर निगम, विकास प्राधिकरण, सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड सहित कई विभागों को जिम्मेदार ठहराया गया। साथ ही नदी को बचाने की अपील की थी। अगली ही सुनवाई में एनजीटी ने यमुना किनारे निर्माणों पर रोक लगाने के साथ डूब क्षेत्र निर्धारण के आदेश दिए थे। इससे रियल एस्टेट कंपनियों को झटका लगा। उस वक्त इन कंपनियों के प्रोजेक्ट या तो चल रहे थे या फिर पूरे होने के कगार पर थे। इस आदेश के बाद लगभग दर्जनभर से अधिक आवासीय प्रोजेक्ट रुक गए। लगभग हर महीने इस पर सुनवाई चल रही है। मगर, अब तक कोई फैसला नहीं आया है। ऐसे में बिल्डरों के करोड़ों रुपये फंस गए हैं।
कर्ज चुकाने को लेकर कर्ज
रियल एस्टेट कारोबार उधार पर चलता है। जैसे-जैसे प्रोजेक्ट पूरे होते जाते हैं, कर्जा चुकाने के साथ लागत और मुनाफा निकालते हैं। मगर, प्रोजेक्ट रुकने से वे बीच में फंस गए हैं। ऐसे में बिल्डर एक कर्ज उतारने के लिए दूसरा कर्ज ले रहे हैं। वह भी छह रुपये प्रति सैकड़ा से अधिक की ब्याज दर पर।
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ग्राहक बना रहे दबाव
बिल्डरों पर दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ तो वे कर्ज में डूबते जा रहे हैं, दूसरी तरफ ग्राहक उन पर बुकिंग राशि वापस करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। दरअसल, तमाम बिल्डरों ने प्रोजेक्ट की शुरुआत में ही मोटी रकम लेकर फ्लैट बुक कर लिए थे।
बिल्डरों से मकान-फ्लैट लेने में घबरा रहे लोग
एनजीटी का आम लोगों में भी काफी खौफ है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिल्डर द्वारा विकसित कालोनी या मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में फ्लैट लेने से लोग कतराने लगे हैं। उन्हें डर है कि जिस बिल्डिंग या कालोनी में वह मकान लेने जा रहे हैं कल को वह भी डूब क्षेत्र के दायरे में न आ जाए।
दस महीने में एक भी बिल्डिंग का नक्शा पास नहीं
रियल एस्टेट में सन्नाटा पसरा हुआ है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 महीने में एडीए में एक भी बहुमंजिला इमारत या आवासी कालोनी का नक्शा पास होने नहीं आया।
अधिकारियों की उदासीनता की वजह से यमुना नदी दम तोड़ रही है। नदी में सीधे गंदगी जा ही रही है, वाटर चैनल भी लॉक हो रहे हैं। इसकी वजह से भू जलस्तर गिरता जा रहा है। मेरी लड़ाई यमुना के लिए हैं, रियल एस्टेट के खिलाफ नहीं।
- डीके जोशी, याचिकाकर्ता
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दम तोड़ती यमुना को उसके मूलस्वरूप में लाने के लिए पर्यावरणविद् डीके जोशी ने एनजीटी में पिछले साल चार मई को जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने यमुना किनारे हुए निर्माणों और गंदगी को नदी के लिए खतरा बताया था। इसके लिए नगर निगम, विकास प्राधिकरण, सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड सहित कई विभागों को जिम्मेदार ठहराया गया। साथ ही नदी को बचाने की अपील की थी। अगली ही सुनवाई में एनजीटी ने यमुना किनारे निर्माणों पर रोक लगाने के साथ डूब क्षेत्र निर्धारण के आदेश दिए थे। इससे रियल एस्टेट कंपनियों को झटका लगा। उस वक्त इन कंपनियों के प्रोजेक्ट या तो चल रहे थे या फिर पूरे होने के कगार पर थे। इस आदेश के बाद लगभग दर्जनभर से अधिक आवासीय प्रोजेक्ट रुक गए। लगभग हर महीने इस पर सुनवाई चल रही है। मगर, अब तक कोई फैसला नहीं आया है। ऐसे में बिल्डरों के करोड़ों रुपये फंस गए हैं।
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कर्ज चुकाने को लेकर कर्ज
रियल एस्टेट कारोबार उधार पर चलता है। जैसे-जैसे प्रोजेक्ट पूरे होते जाते हैं, कर्जा चुकाने के साथ लागत और मुनाफा निकालते हैं। मगर, प्रोजेक्ट रुकने से वे बीच में फंस गए हैं। ऐसे में बिल्डर एक कर्ज उतारने के लिए दूसरा कर्ज ले रहे हैं। वह भी छह रुपये प्रति सैकड़ा से अधिक की ब्याज दर पर।
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ग्राहक बना रहे दबाव
बिल्डरों पर दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ तो वे कर्ज में डूबते जा रहे हैं, दूसरी तरफ ग्राहक उन पर बुकिंग राशि वापस करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। दरअसल, तमाम बिल्डरों ने प्रोजेक्ट की शुरुआत में ही मोटी रकम लेकर फ्लैट बुक कर लिए थे।
बिल्डरों से मकान-फ्लैट लेने में घबरा रहे लोग
एनजीटी का आम लोगों में भी काफी खौफ है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिल्डर द्वारा विकसित कालोनी या मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में फ्लैट लेने से लोग कतराने लगे हैं। उन्हें डर है कि जिस बिल्डिंग या कालोनी में वह मकान लेने जा रहे हैं कल को वह भी डूब क्षेत्र के दायरे में न आ जाए।
दस महीने में एक भी बिल्डिंग का नक्शा पास नहीं
रियल एस्टेट में सन्नाटा पसरा हुआ है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 महीने में एडीए में एक भी बहुमंजिला इमारत या आवासी कालोनी का नक्शा पास होने नहीं आया।
अधिकारियों की उदासीनता की वजह से यमुना नदी दम तोड़ रही है। नदी में सीधे गंदगी जा ही रही है, वाटर चैनल भी लॉक हो रहे हैं। इसकी वजह से भू जलस्तर गिरता जा रहा है। मेरी लड़ाई यमुना के लिए हैं, रियल एस्टेट के खिलाफ नहीं।
- डीके जोशी, याचिकाकर्ता